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मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

पाकिस्तान या आतंकी नहीं, सड़क हादसे ले रहे हैं सबसे ज्यादा जवानों की जान

नई दिल्ली 21 अप्रैल 2015. सोचिए, ड्यूटी पर तैनात रहने वाले भारतीय सैनिकों की सबसे ज्यादा हत्याएं कहां होती है? सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों की गोलीबारी में? जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ युद्ध में? हडिडयां जमा देने वाली सियाचीन की ठंड पर सीमा की सुरक्षा में? जी नहीं! इनमें से कहीं भी नहीं। भारतीय सैनिकों की सबसे ज्यादा मौत रोड ऐक्सिडेंट में होती हैं। सड़क हादसों में साल-दर-साल 300 जवान अपनी जान गंवा रहे हैं ।
भारतीय सैनिकों की जानें कितनी 'सस्ती' हैं इसका अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है कि बिना किसी युद्ध के 1999 के बाद से हमारे 6,500 जवान अपनी जानें गंवा चुके हैं। आखिरी बार 1999 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान की करगिल में घुसपैठ का सामना किया था। अब तक भारतीय सेना ने तीन युद्ध लड़े हैं- 1962 में, 1965 में और 1971 में। इन तीनों युद्धों में इससे आधे सैनिकों की ही जान गई थी। युद्ध में, दुश्मनों या आतंकियों के हमले में, प्राकृतिक आपदाओं या खराब मौसम से और सड़क हादसों में करीब 4700 सैनिकों की जान गई है। तनाव के चलते करीब 100 सैनिक हर साल खुदकुशी कर लेते हैं। 2010 से लेकर अब तक 520 सैनिकों ने खुदकुशी की है। सड़क हासदों की बात करें तो 2003 में 313, 2004 में 315, 2005 में 295 सैनिकों और अधिकारियों की मौत हुई। एक दशक बाद भी आंकड़े उतने ही भयानक है। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के जुटाए आंकड़ों के मुताबिक 2012 में 306, 2013 में 297, 2014 में 284 सैनिकों की सड़क हादसों में मौत हुई। राजधानी दिल्ली में चल रही सेना के कमांडरों की कॉन्फ्रेंस में इस मामले पर चर्चा की जाएगी। इसमें सैनिकों को वाहन चलाने के साथ ही सड़क सुरक्षा के नियम सिखाए जाएंगे और पुराने वाहनों को भी सेना से बाहर किया जाएगा।

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