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शनिवार, 6 मई 2017

न्यायालय जाने पर, आदिवासी परिवार का 2 वर्षों से जारी है सामाजिक बहिष्कार

छत्तीसगढ़ 04 मई 2017 (जावेद अख्तर). राजधानी रायपुर से करीब 100 किलोमीटर दूर पिथौरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंडरीखार में आदिवासी संतराम व उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है। संतराम के परिवार में सात बेटे, बेटियां विवाह योग्य हैं लेकिन सामाजिक बहिष्कार के चलते समाज का कोई भी परिवार बहिष्कृत परिवार से रिश्ता जोड़ने को तैयार नहीं हो रहा।
 

संतराम का इतवारी गोड़ से जमीन को लेकर विवाद चल रहा है मामला आयुक्त कार्यालय रायपुर में वर्षो से लंबित है। इसी दौरान इतवारी के पक्ष में 2 साल पहले एक सामाजिक बैठक हुई और समाज के लोगो ने संतराम और उसके परिवार को यह फरमान सुनाया की इतवारी के पक्ष में जमीन को छोड़ दें। जिस पर संतराम ने कहा कि यह मेरी पैतृक भूमि है मैंने मेहनत कर भूमि को कृषि योग्य बनाया है मैं जमीन को नहीं छोड़ सकता। 

संतराम ने यह भी निवेदन किया कि मामला न्यायालय में चल रहा है आप लोग इस पर कोई निर्णय ना दें। इस बात से नाराज़ बैठक में उपस्थित समाज के ठेकेदार भड़क उठे और तत्काल निर्णय सुना दिया कि आज के बाद संतराम व उसके परिवार को समाजिक कार्यों में सम्मिलित नहीं किया जाएगा और उनसे कोई भी बेटी रोटी का रिश्ता नहीं रखेगा। 

2 वर्षों से बहिष्कार का दंश झेलने को मजबूर - 
समाज की ओर से बकायदा लिखित में एक सूचना जारी कर उक्त आदेश का प्रचार प्रसार करने के लिए निर्देशित किया गया। संतराम के परिवार के धनसाय मानसिंह जगसु ने बताया कि समाज के पदाधिकारियों ने उनका 2 साल से सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है। कोई भी सामाजिक व्यक्ति उनके परिवार से कोई वास्ता नहीं रख रहा है। परिवार में सात पुत्र पुत्रियां विवाह योग्य हैं लेकिन सामाजिक बहिष्कार के चलते उनका विवाह नहीं हो पा रहा है। उनके विवाह की उम्र निकलते जा रही है। 

आसानी से नहीं मिलता है न्याय - 
संतराम ने राज्यपाल तथा राज्य मानवाधिकार आयोग सहित कलेक्टर, एस.पी. व आला अधिकारियों के नाम से तैयार ज्ञापन में समाज के पांच पदाधिकारियों के विरुद्ध नामजद शिकायत करते हुए दंडात्मक कार्यवाही की मांग की है। बहिष्कृत परिवार ने समाज के पदाधिकारियों के ऊपर आरोप लगाया है कि उनका योजनाबद्ध ढंग से सामाजिक बहिष्कार किया गया है। जिससे परिवार बहिष्कार का दंश झेलने के लिए मजबूर हो गया है। समाज के ठेकेदारों ने अपने पद व अधिकारों का दुरुपयोग किया और एकपक्षीय निर्णय सुना दिया जबकि वास्तविकता पूरा समाज जानता है कि उक्त भूमि मेरी पैतृक संपत्ति है फिर भी पूरा समाज इस निर्णय के साथ खड़ा है।

आजादी के सत्तर वर्षों के बाद भी हमें आजादी नहीं मिली और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार करते हुए तानाशाही व अतार्किक फैसला सुना दिया गया। मामला न्यायालय में चल रहा है तो फिर न्यायालय में न्याय के लिए कोई कैसे जाएगा। इतना बड़ा अन्याय खुलेआम हो रहा है जिसकी पूरी जानकारी राज्यपाल, शासन प्रशासनिक के आलाधिकारियों को भी दी गई मगर आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। संविधान और कानून का खुला उल्लंघन किया गया और कानूनी लोग खामोशी से हाथ पर हाथ धरे रख कर चुप्पी साधे हुए हैं। 

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