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सोमवार, 5 सितंबर 2016

सिंगूर के ऐतिहासिक फैसले की नज़ीर पर लोहंडीगुड़ा भूमि वापसी के लिए मुखर होगी आवाज़

छत्तीसगढ़ 05 सितंबर 2016 (जावेद अख्तर). पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा मोटर्स के लिए अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस करने के उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी निजी उद्योगों को जमीन दिए जाने व भूमि पर आज तक किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य शुरू नहीं होने के कारण किसानों व स्थानीय लोगों की आवाज़े मुखर होने लगी है।

सूत्रों के अनुसार अब विरोध का स्तर बड़ा होता जा रहा है व मामला जोर पकड़ता जा रहा है। जगदलपुर में टाटा स्टील द्वारा भूमि अधिग्रहण किया गया परंतु उसके बाद से आज तक उन जमीनों का कोई उपयोग नहीं हुआ और आज भी भूमि बंजर ऊसर व वीरान पड़ी है। जिससे भूमि की उर्वरक क्षमता पहले से आधी रह गई है।

इस संंबंध में मांग उठा रहे छग सर्व आदिवासी समाज के आदिवासी नेता व पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह से मिलकर लोहंडीगुड़ा में टाटा स्टील के लिए अधिग्रहित की गई जमीनों को किसानों को लौटाने की मांग पहले भी कर चुकें हैं परंतु इस पर राज्य सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया, आज भी भूमि का मामला अधर में पड़ा हुआ है। परंतु सिंगूर का फैसला भू-स्वामियों के पक्ष में आने के बाद छग सर्व आदिवासी समाज, गोंडवाना महासभा व अन्य कई संगठन मिलकर इस मामले को पुन: से व्यापक स्तर पर उठाने की तैयारी ज़ोरो पर कर रहें हैं और सिंगूर के निर्णय की नज़ीर को लेकर छग शासन, मुख्यमंत्री व राज्यपाल को आवेदन देंगें तथा सभी प्रभावित किसानों को इकठ्ठा कर व्यापक स्तर पर भूमि वापसी की मांग रखेंगें।

संगठन व महासभा के पदाधिकारियों का कहना है कि अदालत के फैसले का अध्ययन किया जा रहा है। लोहण्ड़ीगुड़ा क्षेत्र में अधिग्रहित जमीन यदि सरकार वापस कर देगी तो ठीक है अन्यथा कानून व न्यायालय की शरण में जाएंगें। इसके पहले लोहण्ड़ीगुड़ा में कांग्रेस भी इस मुद्दे पर अपने स्थानीय विधायक दीपक बैज के माध्यम से आंदोलन कर चुकी है हालांकि इस पर शासन प्रशासन ने कोई ध्यान नहीं दिया। छग सर्व आदिवासी संगठन के वरिष्‍ठ पदाधिकारी सोहन पोटाई, पवन साय, सुनील मिंज, रावटे जी तथा गोंडवाना महासभा के पदाधिकारी विनोद नागवंशी, नेताम जी, मंडावी जी व आदिवासियों के लिए सक्रिय रहने वाले राजनेता व पूर्व राज्यसभा सदस्य नंदकुमार साय व मरवाही के डा. गंभीर सिंह जैसे कई बड़े आदिवासी नेताओं के शामिल होने की जानकारियां भी प्राप्त हुई है।
     
प्रभावित होगी राजनीतिक पार्टियां -
अगर इतने संगठन संगठित होकर भूमि वापसी के लिए मैदान में उतर गए तो राज्य सरकार के लिए नई मुसीबतें खड़ी हो जाएगी, वैसे भी प्रदेश में आदिवासी समुदाय राज्य की भाजपा सरकार से इस बार विगत तीन वर्षों से यानि कि तीसरे शासन काल से कत्तई खुश नहीं है क्योंकि एक के बाद एक करके राज्य सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए जो कि आदिवासी समुदाय के लिए उचित नहीं थे, इससे आदिवासी लोगों में नाराज़गी व गुस्सा भर गया हैै। वहीं आदिवासी नेताओं में जाना माना चेहरा नंदकुमार साय को भी हाल ही में पार्टी से किनारे लगाने से आदिवासी समुदाय खासा आक्रोश व्याप्त हो गया है। अब ऐसी दुर्गम व विषम परिस्थियों में आदिवासी संगठनों के इतने सारे नेताओं का एक बैनर तले आ जाने से आदिवासी वर्ग भाजपा से पूरी तरह कट जाएगा जबकि प्रदेश की कुल जनसंख्या में तकरीबन पैंतीस से चालीस फीसदी आदिवासी वर्ग है।

वहीं अजीत जोगी की नई पार्टी के चलते भी काफी अधिक आदिवासी भाजपा से पहले ही दूरी बना चुके हैं। वास्तविक रूप में देखा जाए तो इसका सीधा सीधा फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा। अगर भाजपा से पूरा आदिवासी वर्ग कट गया तो प्रदेश में बीस सीट लाना मुश्किल से भी मुश्किल हो जाएगा। केंद्रीय भाजपा सरकार से भी अब देश के आम नागरिकों की दिन ब दिन नाराज़गी बढ़ती जा रही है, सर्राफा व व्यापारी वर्ग व दवा दुकानदार भी कटते जा रहें है। किसान तो भरे पड़े हैं। आगामी चुनाव को लेकर अभी तक भाजपा गंभीर नहीं दिखाई दे रही है इसीलिए परिस्थियों के मद्देनज़र तो भाजपा की नाव बुरी तरह से भंवर में फंसती दिखाई दे रही है। यहां पर बड़ा प्रश्न है कि राज्य की भाजपा सरकार ऐसे समय क्या निर्णय लेती है क्योंकि छग में भाजपा के भविष्य का आधा हिस्सा इसी निर्णय पर निर्भर है।

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