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बुधवार, 25 मई 2016

जानलेवा नसबंदी कांड - आरोपियों पर सरकार ने दिखाई दरियादिली, जांच शुरू होने के पहले ही कर दी आरोपी अफसर की बहाली

छत्तीसगढ़/रायपुर 22 मई 2016 (जावेद अख्तर). नसबंदी कांड में सोलह आदिवासी महिलाओं की जाने गईं थीं जिसमें डाक्टरों सहित अधिकारियों को निलंबित किया गया था । अफसरों व डाक्टरों की लापरवाही से नसबंदी आपरेशन शिविर, कत्लखाना बन गया। डिप्टी ड्रग कंट्रोलर हेमंत श्रीवास्तव ने बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार करते हुए अमानक दवाओं को पास किया, नसबंदी कांड में इस अमानक दवाओं की बड़ी भूमिका रही। जिसके चलते ही डिप्टी ड्रग कंट्रोलर भी निलंबित किए गए।

विदित हो कि अभी नसबंदी कांड की जांच पूरी नहीं हो पाई है, उससे पहले ही राज्य सरकार ने दरियादिली दिखाते हुए आरोपी डिप्टी ड्रग कंट्रोलर अधिकारी को बहाली दे दी। राज्य सरकार का भी क्या कहना। आपरेशन शिविर में मृत महिलाओं की आत्माएं तो धन्य हो गई होगी। बहाली आदेश को मनमानी एवं तानाशाही का जबरदस्त उदाहरण भी माना जा सकता है। उल्लेखनीय है कि निलंबित अधिकारी श्रीवास्तव के विरुद्ध 2 मई को विभागीय जांच के आदेश दिए गए थे। विभागीय नियंत्रक पी.वी. नरसिम्हा राव को जांच का जिम्मा सौंपा गया। ऐसे में प्रमुख प्रश्न यह है कि जांच शुरू तक नहीं हो पाई और बहाली आदेश जारी कर दिया गया। यह तो पूरी तरह समझ से परे है। बिलासपुर नसबंदी कांड के आरोपी और निलंबित डिप्टी ड्रग कंट्रोलर हेमंत श्रीवास्तव, 17 मई 2016 को बहाली आदेश विभागीय मुख्यालय पहुंचा और निलंबित अधिकारी ने भी बिना देरी किए 20 मई 2016 को ज्वाइनिंग दे दी तथा मुख्यालय में पदस्थ किया गया है।
निलंबित डिप्टी ड्रग कंट्रोलर हेमंत श्रीवास्तव की बहाली को लेकर शासन व विभागीय कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं। संभावना यहां तक जताई जा रही है कि इससे विभागीय जांच प्रभावित हो सकती है। या शायद जांच को प्रभावित करने के कारणवश ही बहाली दी गई हो? क्योंकि जांच अधिकारियों की टीम, जांच फाइलें, नसबंदी कांड से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तथा प्रमाणों सहित अन्य सभी विशेष जानकारियां हेड आफिस में ही रखी है। विभागीय सूत्रों के हवाले से जानकारी प्राप्त हुई है कि निलंबित डिप्टी ड्रग कंट्रोलर अधिकारी तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री के बेहद करीबी हैं। हाल ही में तत्कालीन एवं वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री की मुलाकात हुई जिसमें लगभग 3-4 घंटे लंबी चर्चा हुई। चर्चा किस विषय पर हुई है यह ज्ञात नहीं हो सका है। हालांकि लंबी वार्तालाप और फिर बहाली यानि दाल में कुछ तो जरूर काला है?
     
ऐसे चली बहाली की फाइल
हेमंत श्रीवास्तव शासन में आवेदन कर रहे थे कि उन्हें बहाल किया जाए। कैसे उन्हें साल भर से अधिक समय तक निलंबित रखा जा सकता है? इस पर शासन ने राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग से जानकारी तलब की। विभाग ने हेमंत से जुड़े हुए तमाम प्रकरणों की बिंदुबार जानकारी भेज दी। यहां से फाइल स्वास्थ्य मंत्री के बंगले होते हुए शासन तक पहुंची थी, जहां से आदेश जारी हुआ।
   
ये हैं बड़े आरोप
नसंबदी कांड - सिप्रोसिन सप्लाई करने वाली फर्म महावर फार्मा को हेमंत श्रीवास्तव ने ही गुड मैन्यूफेक्चरिंग प्रैक्टिस (जीएमपी) सर्टिफिकेट दिया था। 16 महिलाओं की जान जाने के बाद चली प्रारंभिक जांच में उन्हें आरोपी पाते हुए तत्काल निलंबित कर दिया था।
  
जांच में और एक बड़ी लापरवाही
विभागीय जांच रिपोर्ट के अनुसार हेमंत श्रीवास्तव ने यूनाइटेड मेडिकल स्टोर के संचालकों को बचाने के लिए मामले को न्यायालय में पेश नहीं किया। सिर्फ मेडिकल एजेंसी के लाइसेंस को सात दिन के लिए निलंबित किया। रिपोर्ट शासन को सौंपी, लेकिन इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

एक नहीं बल्कि दो शिविरों में लापरवाही
बिलासपुर जिले के ग्राम सकरी, गौरेला, पेंड्रा और मरवाही में नसबंदी शिविरों में महिलाओं की मौत का मामला सामने आया था। ग्राम सकरी के नेमीचंद ट्रस्ट अस्पताल और गौरेला के नसबंदी शिविर में शल्य चिकित्सा के दौरान 13 महिला की मृत्यु हो गई थी। दोनों ही शिविरों में एक ही शल्य चिकित्सा द्वारा आपरेशन किए जाने का मामला भी सामने आया था।

आरोपी दवा कंपनियों के संचालकों व डॉक्टर पर दोष तय
पुलिस ने तखतपुर के पेंडारी के शिविर में नसबंदी कराने वाली महिलाओं की मौत के मामले में डॉक्टर आर.के. गुप्ता के साथ ही दवा कंपनी के संचालकों को दोषी पाया है। पुलिस ने आरोप तय करते हुए 2 हजार 44 पेज का चालान पेश किया है। साथ ही दो आरोपियों की फरारी में धारा 173 (8) के तहत प्रतिवेदन भी पेश किया।

बिलासपुर के तखतपुर क्षेत्र के पेंडारी स्थित नेमीचंद कैंसर हॉस्पिटल में आयोजित शिविर में नसबंदी कराने वाली 15 महिलाओं की मौत हो गई थी, इसके साथ ही गौरेला क्षेत्र में एक आदिवासी महिला की भी जान चली गई। पुलिस ने प्रारंभिक जांच के बाद मामले में ऑपरेशन करने वाले डॉ. आर.के. गुप्ता समेत अन्य के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया था।जांच के दौरान पुलिस ने प्रकरण में सिप्रोसीन, आई ब्रूफेन टेबलेट सप्लाई करने वाली फार्मेसी कंपनी महावर फार्मेसी व कविता फार्मेसी के संचालकों को भी आरोपी बनाया। पुलिस ने अपनी जांच में पोस्टमार्टम व दवाइयों की जांच रिपोर्ट समेत अन्य दस्तावेजों के साथ ही मृत महिलाओं के परिजनों व अन्य गवाहों के बयान भी लिए। पुलिस की जांच में दो तरह से आपराधिक प्रकरण सामने आए हैं। जांच रिपोर्ट में पोस्टमार्टम रिपोर्ट व घटनास्थल का जायजा लेने के साथ ही ऑपरेशन के लिए निर्धारित प्रावधानों का जिक्र किया गया है। मसलन, आरोपी डॉ. गुप्ता ने ऑपरेशन करने में लापरवाही की है। इसके अलावा निर्धारित प्रावधान के तहत ऑपरेशन नहीं किया गया है। वहीं दो महिलाएं नेम बाई व दीप्ति की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सेप्टीसिमिया से मौत होने का उल्लेख है। लिहाजा, पुलिस ने अपनी जांच में डॉ. गुप्ता को दोषी पाया है।इसी तरह सिप्रोसीन व आईब्रूफेन टेबलेट की निर्माता महावर फार्मेसी कंपनी ने दवाई बनाने व वितरण के पहले उसका परीक्षण नहीं कराया था। कंपनी ने इंदौर स्थित अल्फा टेस्टिंग पैथोलॉजी में परीक्षण कराने का दावा किया था। जांच के दौरान पुलिस ने अल्फा पैथोलॉजी कंपनी के डॉयरेक्टर से जवाब मांगा, जिसमें उन्होंने दवाइयों का परीक्षण कराने से इंकार कर दिया।लिहाजा, पुलिस ने जहरीली व अमानक दवाई सप्लाई करने के आरोप में संचालक रमेश महावर व उसके बेटे सुमित महावर पर दोष तय किया। इसी तरह दवा वितरण कंपनी कविता फार्मेसी के संचालक ने भी अमानक दवाइयों का वितरण किया था।साथ ही उसने फर्जी तरीके से कागजात तैयार किया। उसके पास दवाइयों का रिकार्ड भी उपलब्ध नहीं था। लिहाजा, पुलिस ने कविता फार्मेसी के संचालक राजेश खरे, राकेश खरे व मनीष खरे को भी आरोपी बनाया है। जांच में इनके खिलाफ भी दोष सिद्घ किया गया। पुलिस इस मामले के आरोपी राकेश खरे व मनीष खरे को गिरफ्तार नहीं कर पाई है। दोनों पुलिस की नजर में फरार हैं। लिहाजा, पुलिस ने उनकी फरारी में चालान पेश किया है।
 
थानेदार का हुआ बयान
चकरभाठा टीआई एस.एन. शुक्ला ने इस मामले का चालान कोर्ट में पेश किया। इस दौरान कोर्ट ने धारा 299 के तहत उनका बयान दर्ज किया। साथ ही पूछा कि फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए अब तक क्या प्रयास किया गया? इस पर टीआई शुक्ला ने बताया कि फरार आरोपियों की पतासाजी के लिए हर संभव कोशिश की गई, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला और आगे अभी उनके मिलने की संभावना भी कम है।
  
सेशन कोर्ट में चला ट्रॉयल
इस बहुचर्चित मामले का ट्रॉयल सेशन कोर्ट में चला। बिल्हा स्थित व्यवहार न्यायालय से यह मामला डीजे कोर्ट में ट्रांसफर हो गया।
  
जांच रिपोर्ट विधानसभा में प्रस्तुत
बिलासपुर जिले में हुए नसबंदी कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट को छत्तीसगढ़ विधानसभा में पेश की गई थी। पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनीता झा आयोग की अध्यक्षता में गठित एकल सदस्यीय जांच आयोग की इस रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा गया और साथ ही सरकार की ओर से भी एक्शन टेकन रिपोर्ट भी रखी गई।
  
पहले संक्रमण, फिर दवा जिम्मेदार
रिपोर्ट के अनुसार, नसबंदी कांड के लिए सबसे पहले संक्रमण को जिम्मेदार माना गया है। साथ ही दवा को भी महिलाओं की मौतों की बड़ी वजह बताई गई और हालात बिगड़ने की वजह मानी गई है। संक्रमण से लेकर दवा बांटने तक के लिए जितने भी जिम्मेदार रहे, उन सबको रिपोर्ट में दोषी माना गया है। नसबंदी कांड मामले में जिम्मेदार डॉक्टरों, फार्मा कंपनी के संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। साथ ही अमानक दवा खरीद के लिए जिम्मेदार ठहराए गए क्रय समिति के सदस्य तीन चिकित्सकों को भी आरोप पत्र जारी किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि घटना के सालभर पहले ही आईब्रूफेन-400 के निर्माता फर्म को नोटिस जारी किया गया था। साथ ही सभी जिलों को उक्त अमानक दवाइयों का उपयोग नहीं करने के निर्देश जारी किए गए थे। बावजूद इसके अमानक दवाइयों का वितरण किया गया। सरकार उत्तरदायित्व के निर्धारण के लिए जांच कर रही है। सरकार ने प्रारंभिक जांच के बाद जिम्मेदार ठहराए गए डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई कर दी। जांच के लिए पूर्व जिला सत्र न्यायाधीश श्रीमती झा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया था। सरकार की ओर से यह बताया गया कि तत्कालीन सीएमओ डॉ. प्रमोद तिवारी को सस्पेंड कर दिया गया था। सकरी के नसबंदी शिविर प्रभारी डॉ. कतलम सिंह ध्रुव को आरोप पत्र जारी किया गया, साथ ही ऑपरेशन करने वाले चिकित्सक डॉ. आर.के. गुप्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
 
नसबंदी से पहले नहीं ली गई अनुमति
गौरेला में दो बैगा आदिवासी समुदाय की महिलाओं के ऑपरेशन पर यह कहा गया कि विशेष पिछड़ी जनजाति के नसबंदी करने के पूर्व जिला प्रशासन की अनुमति नहीं लेने पर सीएमओ डॉ. ए.एच. मिंज को आरोप पत्र जारी किया गया। यह बात भी सामने आई है कि तखतपुर के तत्कालीन मेडिकल अफसर द्वारा महिला हितग्राहियों से जुड़े चेक लिस्ट और अन्य प्रपत्रों को नियमानुसार नहीं कराया गया। इस मामले पर महिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. निकिता कंवर को आरोप पत्र दिया गया है। रिपोर्ट में विषाक्त सिप्रोसिन के निर्माता कंपनी महावर फार्मा और हरिद्वार के टेक्निकल लैब एंड फार्मा लिमिटेड और कविता फार्मा के खिलाफ भी कार्रवाई की गई। दोनों के संचालकों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया गया, साथ ही महावर फार्मा के जीपीएम प्रमाण पत्र को निरस्त किया गया।
 
बिना परीक्षण के ही दवा बांटी गई
आयोग ने यह पाया कि सकरी और अन्य शिविरों में मरीजों को दिए गए सिप्रोसिन का औषधि परीक्षण नहीं कराया गया। इस मामले में क्रय समिति के सदस्य डॉ. एम.ए. जिवानी, डॉ. के.के. टेरी और डॉ. सी.पी. आगरे के खिलाफ आरोप पत्र जारी किया गया। जांच में यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि चारों शिविरों में वितरित विषाक्त आईब्रूफेन को जिला अथवा राज्य स्तरीय समिति द्वारा क्रय किया गया। इस बारे में शासन ने स्पष्ट किया है कि यह दवा का क्रय शासन स्तर पर किया गया। घटना के एक वर्ष से अधिक पहले संचालक द्वारा संबंधित फर्म के विरूद्ध विधिक कार्रवाई के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, तथा समस्त जिलों को उक्त अमानक दवाइयों का उपयोग न कर राज्य और जिला स्टोर में जमा करने के निर्देश दिए गए। संचालनालय के निर्देश के बावजूद अमानक औषधि के वितरण का उत्तरदायित्व निर्धारण के लिए जांच की जा रही है।
 
अमर अग्रवाल सबसे लापरवाह मंत्री
तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल अपने पहले कार्यकाल से ही विवादित रहे। अनाप शनाप बयान देने में इनका कोई सानी नहीं है। वे हादसे के स्थल पर गुटखा खाते हुए पहुंच जाते थे और हंसते हुए मृतकों के परिजनों से हालचाल पूछते थे।  विचित्र व अजीबोगरीब मंत्री अमर अग्रवाल के ऐसे हजारों मामले सामने आ चुके हैं मगर भाजपा सरकार इन पर अधिक विश्वास करती है इसीलिए तो नसबंदी कांड जैसे भयानक हादसे के बावजूद भी उनका मंत्री पद सुरक्षित ही रहता है। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ प्रदेश में एक के बाद एक करके तीन भयानक आपरेशन शिविर आयोजित किए गए, जिसमें 16 आदिवासी महिलाओं की मृत्यु हो गई तथा 25 आदिवासी महिलाएं गंभीर रूप से बीमार हो गई तथा अंखफोड़वा कांड जिसमें मोतियाबिंद का आपरेशन शिविर आयोजित किया गया, शिविर में 40 मोतियाबिंद रोगियों का आपरेशन किया गया जिसमें से 26 रोगियों के आंखों की रौशनी सदैव के लिए चली गई तथा अन्य मरीजों का मोतियाबिंद बढ़ गया। महावर फार्मा कंपनी ब्लैक लिस्टेड होने के बावजूद भी स्वास्थ्य मंत्री के कारण टेंडर भरने दिया गया तथा दवाईयों की सप्लाई का ठेका भी दे दिया गया। दरअसल महावर फार्मा के संचालक और मंत्री अमर अग्रवाल की गाढ़ी दोस्ती थी जिसके कारण मानकों के विपरीत ठेका दिया गया और जानलेवा दवाईयों की सप्लाई कर दी गई जिसके परिणाम स्वरूप आपरेशन शिविर कत्लखाना बन गया।

* डिप्टी ड्रग कंट्रोलर हेमंत श्रीवास्तव को जांच शुरू होने के पहले ही शासन द्वारा बहाली आदेश पर पी.वी. नरसिम्हा राव, नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग से खुलासा टीवी के पत्रकार जावेद अख्तर ने बातचीत की -


प्रश्न :- नसबंदी कांड में निलंबित डिप्टी ड्रग कंट्रोलर को ज्वाइनिंग दी है क्या?
उत्तर :- हां, उन्होंने 20 मई को ज्वाइनिंग दे दी है। वे मुख्यालय में हैं, अभी उन्हें कोई प्रभार नहीं दिया है।
प्रश्न :- उनके मुख्यालय में होने से जांच प्रभावित नहीं होगी क्या क्योंकि विभागीय जांच की सभी फाइलें एवं महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मुख्यालय में ही है?
उत्तर :- जब फाइल उन तक जाएंगी ही नहीं तो जांच कैसे प्रभावित होगी?
प्रश्न :-  फाईल उनके तक नहीं जा सकती है मगर वो तो फाइल तक जा सकतें हैं?
उत्तर :- जांच अधिकारी की अनुमति के बिना फाईल को छू नहीं सकते हैं।
प्रश्न :- शासन के इस निर्णय से सहमत हैं?
उत्तर :- शासन का निर्णय है।
प्रश्न :- इतनी बड़ी घटना के बाद उनकी बहाली होनी चाहिए थी क्या?
उत्तर :-  मैं इस पर कोई कमेंट्स नहीं कर सकता।

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