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रविवार, 8 नवंबर 2015

वरिष्ठ पत्रकार श्री बब्बन प्रसाद मिश्रा का निधन, छत्तीसगढ़ के मीडिया जगत में छाया मातम


छत्तीसगढ़ 8 नवंबर 2015 (जावेद अख्तर). रायपुर। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के भीष्म पितामह श्री बबन प्रसाद जी मिश्र आज शाम हमेशा के लिए दूर चले गए, एक अंतहीन सफ़र में कभी न लौटने के लिए। अब उनकी स्मृतियों के आशीर्वाद के तले ही शेष जीवन बिताना होगा। आप हमारे दिलों में सदैव रहेंगे। रायपुर के तमाम पत्रकारों व संपादकों में शोक लहर दौड़ गई जब सूचना प्राप्त हुई कि वरिष्ठ पत्रकार बबन प्रसाद मिश्रा जी नहीं रहे। हरेक व्यक्ति हतप्रभ था। मगर नियति का नियम है जो आया है वो जाएगा।

मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने राज्य के वरिष्ठ पत्रकार रायपुर निवासी श्री बबन प्रसाद मिश्रा के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। उन्होंने उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की है और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है। श्री बबन प्रसाद मिश्रा का कल शाम रायपुर में हृदयाघात से निधन हो गया। वे स्थानीय वृन्दावन हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे, जहाँ उनकी तबीयत अचानक खराब हो गयी। उन्हें तुरन्त अस्पताल ले जाया गया था। जहां पर डॉक्टर ने उनकी मृत्यु की पुष्टि की। श्री बबन प्रसाद मिश्रा का जन्म 16 जनवरी 1938 को बालाघाट (म.प.) जिले में हुआ। आपके स्व. पिता श्री राधाकिसन मिश्र स्वंतत्रता संग्राम सैनानी रहे और लगभग 29 महीनों तक अंग्रेजों के कारावास में रहें। आपकी शिक्षा-दीक्षा बालाघाट, वारासिवनी में सागर विश्वविद्यालय के अंतर्गत हुई एंव विधि की स्नातक परीक्षा आपने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर से उत्तीर्ण की। श्री मिश्र जी ने अपनी पत्रकारिता की यात्रा जबलपुर से वर्ष 1962 में प्रारंभ की। वर्ष 1962 से 1972 तक आप दैनिक युगधर्म समाचार पत्र में सह-संपादक रहे। इसी बीच बार-काउंसिल से विशेष अनुमति लेकर कुछ वर्षों तक वकालत भी की। पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश में एंव वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य में चार दशकों से भी अधिक समय से वे साहित्य पत्रकारिता एवं समाजसेवा से जुड़े रहें। वर्ष 1972 से 1986 तक वे दैनिक युगधर्म रायपुर के संपादक रहे। कुछ समय तक वे भोपाल में दैनिक स्वदेश समाचार पत्र से जुड़े रहे। वर्ष 1987 से 2001 तक दैनिक नवभारत रायपुर के संपादक रहे। वर्ष 2001 से 2003 तक दैनिक भास्कर रायपुर एवं बिलासपुर के लिए प्रबंधकीय सलाहकार के रूप में उन्होने अपनी सेवाएं प्रदान की। वे रायपुर प्रेस-क्लब के अध्यक्ष, छत्तीसगढ साहित्य परिषद के संस्थापक महामंत्री तथा छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक विकास परिषद के अध्यक्ष के पद को सुशोभित करते रहे हैं।

दुखद अनुभव -
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के पितामह अपनी जीवनी में लिखते है जीवन भर पत्रकारिता करने के बाद पता चला है कि मालिक मालिक होता है और नौकर नौकर। क्रॉस मीडिया ऑनरशिप के जमाने में पूंजीपति ही मीडिया समूहों को चलाने की क्षमता रखते हैं। दरअसल सारा मामला संपादकीय विभाग और मार्केटिंग विभाग के बीच का था। बबन प्रसाद मिश्रा जी रायपुर नवभारत में संपादक थे और खबरों के चयन और विज्ञापन की जगह को लेकर हुए विवाद के बाद श्री मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया था। आपको बता देना होगा सही होगा कि बबन प्रसाद मिश्रा ने ही छत्तीसगढ़ में नवभारत अखबार की नींव रखी थी इस संदर्भ का उल्लेख इसलिए किया जा रहा है कि ताकि मीडिया में पूंजी के हस्तक्षेप को समझा जा सके।

- वर्ष 2011 में कम्प्यूटर और इंटरनेट पर वरिष्‍ठ पत्रकार श्रीमान बबन प्रसाद मिश्र जी के विचार - 
वर्तमान परिवेश में इंटरनेट तकनीक से ज्ञान अर्जन समय की आवश्‍यकता है, किन्‍तु इंटरनेट का दुरूपयोग रोकने के लिए बच्‍चों के साथ पाठकों को भी इंटरनेट का ज्ञान व जुड़ाव रखना आवश्‍यक है। यह विचार पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी सृजन पीठ के अध्‍यक्ष, वरिष्‍ठ पत्रकार, साहित्‍यकार श्रीमान बबन प्रसाद मिश्रा ने 'इंटरनेट पत्रकारिता से बढ़ता प्रभाव' विषय पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए कही थी। भाग्‍योदय सेवा आश्रम द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में राज्‍य भर के आमंत्रित प्रतिनिधि शामिल हुए। मुख्‍य वक्‍ता के रूप में श्रीमान मिश्रा जी ने कहा की पत्रकारों एवं समाचार पत्रों के लिए इंटरनेट एक अनिवार्य उपकरण बन गया है। इंटरनेट से पत्रकारिता एवं इंटरनेट पर पत्रकारिता दोनों बातों के लिए सावधानी आवश्‍यक है। इससे पत्रकारों का प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है एवं इंटरनेट पत्रकारिता के क्षेत्र में असीम संभावनाएं व्‍याप्‍त हो गयी है। इंटरनेट पत्रकार आज विश्‍वव्‍यापी हो गए है। पत्रकारों के कार्यक्रम एवं विषय क्षेत्र में यह परिवर्तन इंटरनेट के बढ़ते प्रभावों का घोतक है। उन्‍होंने वर्तमान समय में हो रहे इंटरनेट के इस्‍तेमाल को पत्रकारिता के लिए प्राण वायु बताया।

- ऐसा क्यों? 4 मई 2013 लेख : श्री बबन प्रसाद मिश्रा।
वृद्धावस्था हमारे जीवन की नियति है। पैदा होना हमारे वश में नहीं किन्तु जो वस्तु या बात हमारे वश में है वहा है कि हम जियें कैसे? कैसा हो हमारा जीवन? माथे पर चिंता की अमिट रेखाएँ, मन में तूफानों वाली बेचैनी, जमाने के प्रति विद्रोह जैसी धारणा, परिवार में सभी को अपने अनुकूल न पाने की व्यथा और जो कुछ भी जीवन में संचित धन है उसके प्रति असाधारण आसक्ति पूर्ण विचार एक गतिशीलता। आयु 70 वर्ष से पार किन्तु घर के आँगन में एक लोहे या लकड़ी का टुकड़ा यूँ ही पड़ा दिखलाई दे तो घर भर के लोगों को गैर जिम्मेदार और नाकारा समझने की दुष्प्रवृत्ति इस आयु में? ऐसा क्यों? जबकि धर्म चिंतन कहता है कि जिस किसी का जीवन 70 वर्ष 70 दिन 70 घंटे और 70 मिनट की पूर्णता प्राप्त कर लेता है वह संत-जीवन का आग्रही हो जाता है। उसे काम, क्रोध, लोभ, मद और मोह से मुक्तता लेकर जीना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। वृद्धावस्था में और किसी प्रवृत्ति को बढ़ा देखा जाये या नहीं किन्तु लालच और संग्रह का भाव तथा अपनी अहमन्यता को वृद्धिगत देखना बुढ़ापे की बहुत बड़ी बीमारी होती है। मैं, मेरा और मेरे लिए में सिमटी जीवन की शेष श्वासों के प्रति बेपरवाह यह आयु-वार्धक्य वास्तव में हमारी त्रासदी ही समझें। इससे मुक्ति का मार्ग सोचें। जीवन में जो चाहा जीवन भर किया, मनचाहा पहना, मनचाहा खाया, मनचाहा घूमा किए और मनमर्जी से जीया। इसके बाद तो एक बात ध्यान में रखने योग्य है –

चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह
जाको कछु न चाहिए, वा ही शाहंशाह

किन्तु यह साधना सरल नहीं है। खासकर आजकल के माहौल में जब घर-परिवार के सारे नाते-रिश्ते उपयोगिता, उपभोग और अपेक्षा से अधिक लालसाओं से जुड़े हों। आयु के बढ़ते दौर में भी आज की सोच है कि वह जो बूढ़ा है, उसकी उपयोगिता घर-परिवार में कितनी रह गई है। यदि वह उपयोगी न रहा तो बीमार की इंजेक्शन की उस सुई की तरह देखा जाता है जिसका उपयोग होते ही उसे खराब होना माना जाता है। "यूज एण्ड थ्रो" की थ्योरी तक ऐसे लोगों का जीवन सिमटता जाता है। ऐसी सिमटती श्वासें अपने बारे में चाहे जितने गुलाबी विचार ले आयें, उन्हें आयुवार्धक्य के दौर में जीने का नया तरीका तो ढूँढ ही लेना चाहिए। वह भी इसके पूर्व कि जिन्दगी बोझिल लगने लगे।

- उन्होंने वर्षों तक साहित्यिक, सांस्कृतिक विशेषांको का संपादन किया हैं तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में आपकी बहुचर्चित पुस्तक ''मैं और मेरी पत्रकारिता'' अनेक पत्रकारों के लिए दिशाबोधक एंव मार्गदर्शक का कार्य कर रही है।

वे वर्तमान में कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर की विद्वत परिषद के लिए महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ, द्वारा मनोनीत किए गए हैं तथा वर्तमान में छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग के अंतर्गत स्थापित पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ के अध्यक्ष थे। उनके आलेखों की कृति ''आजादी की आधी सदी'' बहुचर्चित कृति हैं जो गतवर्ष प्रकाशित हुई। आपको छत्तीगढ़ शासन द्वारा सर्वोच्च साहित्य-पत्रकारिता सम्मान ''पंडित सुंदरलाल शर्मा'' सम्मान से विगत वर्ष राज्योत्सव में महामहिम उपराष्ट्रपति श्री भैरोसिंह शेखावत द्वारा सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त आपको पत्रकारिता एवं साहित्य सेवाओं के लिए अनेक सम्मान्नीय संस्थाओं ने भी सम्मानित किया हैं। बबन प्रसाद मिश्र जी के पार्थिव शरीर का 8 नवंबर 2015 रविवार दोपहर 1 बजे देवेन्द्र नगर रायपुर के मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार किया जाएगा।

मेरी एक छोटी सी मुलाकात -
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार और करीब डेढ़ दशक तक नवभारत, रायपुर के प्रधान संपादक का दायित्व संभालने वाले श्री बबन प्रसाद मिश्रा जी के घर उनसे मिलने गया था। जिस समय मैंने रायपुर में अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की तब मैंने जाना कि श्री बबन प्रसाद मिश्रा जी को छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का भीष्म पितामह क्यों कहते हैं। बबन प्रसाद मिश्रा जी एक समय नवभारत की कमान संभालते थे और इसकी नींव भी उन्होंने ही रखी थी। इतना सब करने के बावजूद भी संपादक पद से उनकी विदाई होने की बात और अखबार छोड़ने की वजह नहीं पता थी। मैं जब उनसे मिला तो उत्सुकतावश इस प्रश्न को पूछा तब उन्होंने धीरे से मुस्कुराते हुए मुझे देखा और कहा कि दो मिनट रूको तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देता हूँ। फिर उन्होंने खुद ही पत्रकारिता पर लिखी अपनी पुस्तक भेंट की और अखबारों से खुद को अलग करने की कहानी बताई। उन्होंने जो बताया उसके अनुसार, जिस दिन उनके पुत्र की सगाई हो रही थी, उसी दिन अचानक नवभारत समाचारपत्र के महाप्रबंधक का फोन आया कि नवभारत के एक मालिक और दो अन्य महाप्रबंधक उनसे मिलने रायपुर आ रहे हैं। श्री मिश्रा जी ने उन्हें सीधे घर पर आने का न्योता दे दिया। जब वे लोग उनके घर पहुंचे तब एक महाप्रबंधक ने श्री मिश्रा जी अलग ले जाकर कहा कि हमारे मालिकों ने एक फैक्ट्री खरीदी है, जिसके लिए संस्थान को पैसों की जरूरत है। अभी सात संस्करण निकाले जा रहे हैं तो सभी जगह से एक बड़ी रकम इकठ्ठा करना है। इसलिए आपको मुख्यमंत्री अजित जोगी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल, पूर्व मुख्यमंत्री श्यामा चरण शुक्ल और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस से पैसों का इंतजाम करना है। श्री बबन प्रसाद मिश्रा जी ने हल्के से अंदाज में कहा कि कितने पैसे चाहिए, पैसे तो मैं ही दे सकता हूं, मगर रूपए नहीं? महाप्रबंधक को जब समझ आया तब वे झेंप गए। तो उन्होंने बात बदलते हुए कहा कि रूपए का इंतजाम करना है? श्री मिश्रा जी सकते में आकर बोले, मैंने तो किसी से कभी एक रूपए नहीं मांगे, लाखों की मांग कैसे करूंगा? उस समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ला को भी आना था इसलिए उन्होंने अपने महाप्रबंधक व मालिक की मौजूदगी में उनके द्वारा पेशकश का प्रस्ताव दिया। 

वीसी शुक्ला समारोह में उपस्थित हुए और जब वीसी शुक्ला खाना खा रहे थे तो बबन प्रसाद मिश्रा जी ने उनकी ओर मुखातिब होकर कहे - कि आप से एक गुजारिश है कृपया एक बड़ी राशि का प्रबंध करा दें जिसको वापस नहीं किया जा सकेगा। इतना सुनते ही वीसी शुक्ला ने खाना बीच में रोककर कहा "क्या आपने इसीलिए मुझे आमंत्रित किया था"। जिसके बाद श्री मिश्रा जी कुछ भी नहीं कह पाए। नवभारत के प्रबंधकों ने शाम को श्री बबन जी को कार्यालय पहुंचने को कहा। नवभारत के मालिक व महाप्रबंधकों के मध्य जाने क्या बातचीत हुई कि श्री बबन जी के कार्यालय पहुंचने से पहले ही मालिक ने दूसरा निर्देश दे दिया "आज से वीसी शुक्ला की खबरें चलाना बंद" कोई भी आदेश दे मगर खबर नहीं चलेगी। और फिर यही तरीका श्यामाचरण शुक्ल और अन्य नेताओं के साथ भी अपनाया गया मगर सभी ने अपने अपने तरीके से कुछ न कुछ बहाना बनाते हुए राशि देने से मना कर दिया। तब मुख्यमंत्री ने तो कहा - बबन जी, उन्हें आप अपने कार्यालय के सामने बने एक बड़े दैनिक का गेट दिखला दें जिस पर उन्होंने बुलडोजर चलवाया था। शायद समझ आ जाए। इसके बाद श्री बबन मिश्रा जी वापिस अपने घर आ गए। अगले ही दिन सुबह सो कर उठे तो अपने ही अखबार के प्रथम पृष्ठ (कवर पेज) को देखकर सकते में आ गए। दर-असल पहले पन्ने पर किसी आंवला तेल का विज्ञापन पूरे कवर पेज का छपा था और यह भी कहीं उल्लेखित नहीं था कि आज का प्रथम पृष्ठ, पृष्ठ क्रमांक तीन पर देखें। यह देखकर उनका मन उदास हो गया और उन्होंने तत्काल नवभारत रायपुर के प्रबंधक को फोन लगाकर इस बाबत पूछा। तो प्रबंधक से जवाब मिला - मालिक का आदेश था कि यह विज्ञापन आपकी जानकारी के बिना ही छापा जाए। श्री बबन मिश्रा जी इसके बाद कार्यालय नहीं गए और सीधे अपना इस्तीफा भेज दिया अर्थात इस पूरे प्रकरण के बाद श्री बबन प्रसाद मिश्रा जी ने नवभारत से अपना नाता तोड़ लिया। संभवत: छत्तीसगढ़ से ही अखबारों की पैकेज राजनीति की शुरुआत हुई है।

- मैंने उनसे एक और प्रश्न पूछ बैठा कि आज के दौर में अधिकांश दैनिक अखबारों ने यही रणनीति अपनाई हुई है?
जिस पर श्री बबन जी ने कहा कि अगर समाचारपत्र के कवर पेज पर विज्ञापन ही छापना है तो उस समाचारपत्र की विश्वसनीयता कैसे बनेगी। क्योंकि अगर आगाज़ ही विज्ञापनों से होगा, अंजाम भी तो वैसा ही मिलेगा। समाचारपत्र न होकर विज्ञापनपत्र हो जाएगा। और विज्ञापनपत्र से कौन सा शासन प्रशासन डरेगा, आम जनता का हित होगा। इसीलिए वर्तमान दौर में समाचारपत्र, संपादक व पत्रकारों की स्थिति से सहज ही समझा जा सकता है।

- कौतूहलवश मैंने एक और प्रश्न किया कि वास्तव में समाचारपत्र क्या होता है?
उन्होंने बस इतना ही कहा कि जो समाचारपत्र चाटुकारिता से परे व जनहित में समाचारों का प्रकाशन करें। हर वो बात जो शासन प्रशासन छुपाना चाहे जो कि गलत है, उसे आम जनता के समक्ष पेश कर दे।

श्रद्धांजलि -
रायपुर, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित सलाम छत्तीसगढ़ अख़बार के पूरे परिवार व खुलासा द विज़न अखबार और वेबपोर्टल के संपादक पुनीत निगम, छ.ग ब्यूरो प्रमुख जावेद अख्तर, रवि कुमार, संदीप श्रीवास्तव, जियाऊल हुसैनी, रवि कुमार अग्रवाल सहित समस्त लोगों की ओर से अश्रुपूर्ति श्रद्धांजलि।

शत शत नमन। 


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