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शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

छत्तीसगढ़ - कैम्पा फण्ड का कैश, अधिकारियों की ऐश

रायपुर/छत्तीसगढ़ 24 जुलाई 2015(जावेद अख्तर). सामान्य वन मंडल कार्यालय, रायपुर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का पनाहगाह बनता जा रहा है। इस कड़ी में एक और अफसर वन मंडलाधिकारी अभय श्रीवास्तव का नाम भी जुड़ गया है। ये सामान्य वन मंडल कार्यालय, रायपुर में वन मंडलाधिकारी के पद पर पदस्थ हैं। सूत्रों के मुताबिक डीएफओ अभय श्रीवास्तव ने भी बीते कई वर्षों में राज्य सरकार की मुसीबतें खासी बढ़ा दी हैं। विश्वस्त सूत्रों से यह जानकारी भी प्राप्त हुई कि डीएफओ की इन बेलगाम करतूतों से वन विभाग के सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक भी खासे नाराज हैं।
हालांकि सूचना है कि डीएफओ रायपुर की इन गैर जिम्मेदाराना हरकतों के पीछे वन विभाग के सचिव का ही सरंक्षण रहा है, सचिव के वरदहस्त होने के कारण ही वन मंडलाधिकारी और उप-वनमंडलाधिकारी पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। मगर कहावत है कि समय अधिक बलवान होता है तो यहाँ पर भी स्थिति ऐसी ही बनती दिख रही है। पहले सचिव के सरंक्षण से चारों ओर काली करतूतों का अंबार लगा लिया और अब उन्हीं करतूतों से बचने का रास्ता खोजा जा रहा है। वर्तमान में संभवतः राज्य सरकार भी इनकी मनमर्ज़ियों से परेशान सी नज़र आने लगी है। वैसे देखा जाए तो वन विभाग बीते कुछ सालों से लगातार विवादग्रस्त विभाग बना ही हुआ है। इन्हीं कारणों से, राज्य सरकार के मंत्री वन विभाग की जिम्मेदारी लेने से कतरा रहें, इसीलिए इस विभाग की कमान प्रारंभ से ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने स्वंय के हाथों में ले रखी है। देखा गया है कि एक मंत्री, एक साथ दो या तीन विभागों को सही तरीके से संभाल पाता है मगर राज्य के मुख्यमंत्री ने एक साथ सात विभागों की जिम्मेदारी ले रखी है, इस कारण मुख्यमंत्री के तहत आने वाले विभागों में भ्रष्टाचार तेज़ी से फैल गया और मुख्यमंत्री इस पर काबू पाने में सफल नहीं हुए। जिसका परिणाम आए दिन घोटालों के खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री के अन्तर्गत आने वाले वन विभाग में भी भ्रष्टाचार की सारी हदें पार हो चुकी हैं और मुख्यमंत्री वन विभाग में बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। ताज़ातरीन मामला वन विभाग रायपुर के सामान्य वन मंडल कार्यालय का है। यहाँ पर वनमंडलाधिकारी (डीएफओ) अभय श्रीवास्तव और उप-वनमंडलाधिकारी एम.बी.गुप्ता पदस्थ हैं। वनमंडलाधिकारी को ही कैम्पा कोष का वनमंडलाधिकारी भी नियुक्त किया गया है।

कैंपा के विरूद्ध जनहित याचिका
छत्तीसगढ़ में भयंकर भ्रष्टाचार से संबंधित एक वरिष्ठ पत्रकार की याचिका सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार कर ली गई है। श्री नारायण सिंह चौहान (वरिष्ठ पत्रकार) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ के कैम्पा फण्ड (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (CAMPA)) में भ्रष्टाचार पर दाखिल जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने 26 जून 2014 को स्वीकार कर ली गई थी। सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बाद केंद्र ने 2009 में उजड़े वनों के लिए फिर से वनीकरण (Afforestation) हेतु इस कोष का गठन किया था। इस कोष में छत्तीसगढ़ सरकार को 1800 करोड़ की राशि मिलनी थी, जिसमें से 400 करोड़ उन्हें मिल चुक हैं। इस पैसे से राज्य के आईएफएस, आईएएस और मंत्रियों ने खूब ऐश किया और केंद्र के गाइडलाइन के साथ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भी खुली अवहेलना की। इसी पैसे से महँगी गाड़िया खरीदी गई और बंगले बनवाए गए। करीब 100 करोड़ की राशि इन भ्रष्टाचारियों ने सीधे सीधे मात्र कूटरचना करके डकार ली। हालांकि उक्‍त पत्रकार को वन माफिया और आईएफएस लॉबी ने मानसिक तौर पर खूब प्रताड़ित किया और कई बार आरटीआई में जानकारी देने से भी इंकार किया था। बावजूद इसके उन्‍होंने हार नहीं मानी और उनके द्वारा संकलित करीब 3000 पन्नों के दस्तावेज बताते हैं कि राज्य के एक दर्जन आईएफएस अधिकारी इस मामले में भ्रष्टाचार के सीधे दोषी हैं। पत्रकार पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पैरवी मशहूर अधिवक्ता कॉलिन गोन्साल्वीज कर रहे हैं। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि कैंपा कोष से प्राप्त राशि को राज्य सरकार, वन विभाग सचिव, वन विभाग के आलाअधिकारी और वनमंडलाधिकारी ने मिलीभगत करके राशि का उपयोग स्वंय के हित में किया है और इस खेल में वनमंडलाधिकारी एक खास कड़ी हैं। याचिका को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने रमन सरकार और उनके करीबी सचिव, उच्च अधिकारियों और वनमंडलाधिकारी के खिलाफ याचिका को स्वीकार कर लिया। विवादित वनमंडलाधिकारी एक के बाद एक शासन प्रशासन के आदेशों की अवहेलना करने में माहिर माने जाते हैं। इसी क्रम में उन्होंने आरटीआई में अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में असहमति जताई है। लेकिन कारण क्या है? यह समझ से बाहर है। बहरहाल इतना तो वनमंडलाधिकारी को अवश्य समझ आ गया है कि अगर लिखित में कुछ भी दिया तो लेने के देने पड़ जाएंगे इसलिए अपनी गर्दन फंसने से बचाने का एक कारगर उपाय है कि असहमति जता दी जाए। मगर शासन को अपनी संपत्ति का ब्यौरा न देने से क्या अर्थ निकाला जा सकता है? अब ये तो राज्य सरकार और वन विभाग के नये मंत्री को विचार करना है और उस पर कार्रवाई की योजना बनानी है। वन विभाग के नये मंत्री के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है रायपुर सामान्य वन मंडल कार्यालय और कैम्पा कोष का वन परिक्षेत्र कार्यालय, पंडरी में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कोई उचित कदम उठाना। इन दोनों ही कार्यालयों में कई ऐसे पुराने घाघ बैठें हैं जो शासन के रूपयों का जमकर दुरूपयोग करते हैं और स्वंय की संपत्ति बनाने में जुटे हैं। 

 भ्रष्टाचार की खुली लूट की कहानी

- राज्य सरकार के अधिकारियों ने राज्य के वनों को सुधारने के लिए बने छग राज्य क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष प्रबंध एंव योजना प्राधिकरण यानि कैम्पा के जरिए से 107 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि की हेराफेर की है। 

- कैग की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार का वन विभाग क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए गैर वनीय भूमि उपलब्ध होने के बावजूद भी गैर वनभूमि अनुपलब्धता के प्रमाण पत्र जारी करके अपनी काली करतूतों को छुपाने की लगातार कोशिशें करता आया है। जिन स्थानों पर बिगड़े वन क्षेत्रों में क्षतिपूर्ति वनीकरण का कार्य दिखाया गया है वो भी लगभग 75 प्रतिशत से अधिक फर्जी है। कार्य कराने के नाम पर कैम्पा कोष की राशि को मिल जुल कर दुरूपयोग किया गया और कई फर्जी कार्यों, स्थानों और बिलों को प्रस्तुत किया गया है। प्रति दर के हिसाब से गलत दरों के द्वारा प्रयोग किया गया है, मार्गदर्शिका या स्वीकृति आदेश की अवहेलना की गई और अकारण की मांग जारी करके अठ्ठासी करोड़ सत्तान्वे लाख रुपये (88.97 करोड़) क्षतिपूर्ति वनीकरण की लागत, शुद्ध मूल्य व प्रतिशत और तादाद आदि का रोपण किए बिना व बिना जांच के ही राशि का भुगतान कर दिया गया तथा क्षतिपूर्ति वनीकरण में शुद्ध प्रत्याशी दर पर भी वसूली कम की गई है। 

- कैग में दर्ज रिपोर्ट के आधार पर, छग के प्रधान वन मुख्य संरक्षक ने बिगड़ते वनों के सुरक्षा व बहाली के लिए 400 पौधे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पहले दो वर्षों के कार्य के लिए जिसमें सर्वेक्षण, सीमांकन, क्षेत्र की तैयारी तथा पौधों की रोपणी को शामिल किया था, प्रति हेक्टेयर पन्द्रह हज़ार एक सौ रूपए (रू.15,100/-) खर्च का निर्धारण किया गया। सह-निर्माण अक्टूबर 2010 में हुआ था लेकिन वनमंडलाधिकारी धमतरी और पूर्वी सरगुजा के पांच कक्षों में बावन हज़ार सात सौ रूपए (रू.52,700/-) प्रति हेक्टेयर खर्च किया गया यानि कि दो करोड़ सत्तावन लाख रुपये (2.57 करोड़) का अतिरिक्त खर्च किया गया और जिसकी जानकारी भी छुपाई गई। यहाँ तक कि उच्च अधिकारियों को कोष की राशि के दुरूपयोग की जानकारी हो जाने के बाद भी मामले को संज्ञान में नहीं लिया गया और न ही किसी भी प्रकार की कार्यवाही ही की गई। 

- कैम्पा कोष की राशि से इको टूरिज्म पर भी जम कर खर्च किया गया है और इस अतिरिक्त खर्च के फर्जीवाड़े में सामान्य वन मंडल कार्यालय, रायपुर के वनमंडलाधिकारी और पंडरी परिक्षेत्र कार्यालय के रेंज अधिकारी दोनों की ही भागीदारी है। राज्य सरकार ने वन संरक्षक अधिनियमों की धज्जियां उड़ाते हुए 77.500 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग ईको टूरिज्म केन्द्र के विकास में खर्च कर दिया है। जबकि मार्गदर्शिका और भारत सरकार के दिशा निर्देशों के विपरीत महंगे वाहनों की खरीदी की गई, अधोसंरचना निर्माण और ईको टूरिज्म गतिविधियों पर बारह करोड़ इकत्तीस लाख रुपये (12.31 करोड़) का अनाधिकृत व्यय किया गया है। इस मामले पर उच्चतम न्यायालय में याचिका भी दायर की गई है जिसमें सिलसिलेवार गतिविधियों की पूरी जानकारी का ब्यौरा दिया गया है। 

- इसके अलावा कैम्पा कोष की राशि को मनमाने ढंग से खर्च किया जा रहा है जंगल सफारी में, और जंगल सफारी के नाम पर बेहिसाब राशि का भी दुरूपयोग सामने आया है, और इस राशि की बंदरबांट में भी सामान्य वन मंडल कार्यालय, रायपुर के वनमंडलाधिकारी अभय श्रीवास्तव, उप-वनमंडलाधिकारी एम.बी.गुप्ता और पंडरी परिक्षेत्र कार्यालय के रेंज अधिकारी सिन्हा तीनों की बराबर की भागीदारी है। छग राज्य कैम्पा कोष द्वारा जंगल सफारी के अन्तर्गत स्वीकृत कार्य करने में दो करोड़ चालीस लाख रुपये (2.40 करोड़) का अतिरिक्त अनाधिकृत व्यय भी किया गया है। 

- मुरूम संग्रहण पर चालीस करोड़ बीस लाख रुपये (40.20 करोड़) अनाधिकृत व्यय किया गया है। - कैम्पा कोष के तहत विशेष प्रजाति रोपण योजना में भी पिछले कई वर्षों में रोपण होने के बावजूद गलत क्षेत्रों का चयन कर गलत प्रजातियों को चयनित किया गया और उच्चतम दर का भुगतान कर एक करोड़ सात लाख रुपये (1.07 करोड़ ) अनाधिकृत खर्च किया गया है। जबकि कैम्पा कोष और वन विभाग के अधिनियमों के विपरीत जाकर कार्य करने को दर्शा रहा है बावजूद इसके वन विभाग के उच्च अधिकारी और राज्य सरकार कार्यवाही करने की बजाए इन भ्रष्टाचारियों को बचाने का प्रयास कर रही है और कैग रिपोर्ट के आंकड़ों को भी अनदेखा करते हुए राज्य के वन मंत्री ने केंद्र से कैम्पा कोष के तहत बकाया राशि की एकमुश्त मांग की है। जबकि होना यह चाहिए कि पहले इन भ्रष्टाचारियों को उनके किए गए भ्रष्टाचार के तहत कार्रवाई होनी चाहिए उसके पश्चात ही बकाया राशि की मांग रखनी चाहिए थी। 

- कैम्पा कोष के दुरुपयोग की कहानी कैम्पा के गठन वर्ष 2009 के बाद जब पहली बार कैम्पा कोष के तहत राज्य को राशि आवंटित की गई थी तब से ही वन विभाग में लूट का यह खेल खेला जा रहा है, वर्तमान स्थिति तक में कैम्पा कोष के दुरुपयोग के आंकड़ों पर एक नजर डालें तो आंकड़े हैरान कर देने वाले प्राप्त होतें हैं। सबसे अधिक आश्चर्य चकित करने वाली बात यह है कि वनमंडलाधिकारी, उप-वनमंडलाधिकारी और रेंज अधिकारी तीनों ने मिलजुल कर प्रधान मुख्य वन संरक्षक को भी भ्रम में रखा और उनके पास तक कई फर्जीवाड़े को पहुंचने तक नहीं दिया गया और आंकड़ों में भी हेराफेरी कर गलत दस्तावेज उनके समक्ष प्रस्तुत किया गया है जिसकी भनक प्रधान मुख्य वन संरक्षक को काफी बाद में लगी, यानी कि इन भ्रष्टाचारियों ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक तक को नहीं बख्शा है। रिकार्डों में भी हेराफेर की संभावना जताई गई है। 

- सूत्रों के अनुसार, वनमंडलाधिकारी काफी ऊपर तक पहुंच रखतें हैं जिस कारण से वह इतने बड़े बड़े भ्रष्टाचार करने के बावजूद भी आज तक पूरी तरह सुरक्षित हैं और भविष्य में फिर से कई बड़े भ्रष्टाचार करने की योजनाओं की रूपरेखा तैयार की जा रही है। सूत्रों की मानें तो इस बार जंगल सफारी के नाम पर जोरदार हेराफेर की जाने की संभावना है और कुछ स्थानों पर सागौन रोपड़ी में भी हेराफेर की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, कैम्पा कोष के मद से इस बार फिर से तीन नयी लग्ज़री वाहनों की खरीदी करने की भी योजना तैयार की गई है जिसके तहत वन मंत्री, सचिव और वनमंडलाधिकारी इन लग्जरी वाहनों का उपयोग करेंगे। वाहनों में डस्टर नामक चारपहिया वाहन का चयन किया गया है। 

इस सबके बावजूद भी वर्तमान 2015 के जुलाई माह तक में वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों में कोई परिवर्तन नहीं आया है, आज भी लूटमारी चालू है, रायपुर सामान्य वन मंडल के वनमंडलाधिकारी अभय श्रीवास्तव की अड़ियलबाज़ी और भर्राशाही निरंतर चालू ही है। भ्रष्टाचार की यह कहानी कोई नई नहीं है बल्कि लगभग पांच वर्षों से लगातार जारी है। वन विभाग की कमान नये मंत्री को मिलने के बाद कुछ हद तक उम्मीदें जागृत हो उठीं हैं कि वनमंडलाधिकारी, उप-वनमंडलाधिकारी, रेंज अधिकारी, क्लर्क और अन्य सभी शासकीय कर्मचारी जो इन भ्रष्टाचारों में सम्मिलित हैं उन पर जांच कराई जाए और सख्त कार्रवाई की जाए, और दोषी पाए जाने वालों से शासन की राशि की वसूली भी की जाए, सारी संपत्ति को कुर्क करने जैसी प्रक्रिया भी अपनायी जाए ताकि ऐसे भ्रष्टाचार करने वालों के लिए यह कारवाई सबक साबित हो जाए और भ्रष्टाचार करने से पहले उनके अंदर इस बात का डर पैदा हो जाए कि गर पकड़े गए तो अंजाम कैसा होगा। जिस दिन ऐसा हो गया समझ लीजिए कि भ्रष्टाचार पर लगाम कस गई।
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