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बुधवार, 2 जनवरी 2019

रेल प्रशासन की लापरवाही, जर्जर ट्रैक पर दौड़ रही शताब्दी व राजधानी एक्सप्रेस

कानपुर 02 जनवरी 2019 (महेश प्रताप सिंह). डेढ़ सौ से अधिक जानें ले चुके पुखरायां रेल हादसे की यादें अभी जेहन से मिट भी नहीं पाई हैं और रेल प्रशासन ऐसा ही हादसा दोहराने पर आमादा है। शताब्दी और राजधानी जैसी तेज रफ्तार ट्रेनें ऐसे ट्रैक पर दौड़ाई जा रही हैं, जो खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है।


गोविंदपुरी स्टेशन से जूही पुल तक ट्रैक नंबर तीन और चार की पड़ताल की गई। यह कानपुर से दिल्ली के बीच सबसे व्यस्त ट्रैक है। शताब्दी-राजधानी समेत कई प्रमुख ट्रेनें इसी से होकर गुजरती हैं। ट्रैक नंबर तीन से दिल्ली की ओर जाने वाली और चार से आने वाली ट्रेनों को गुजारा जाता है। किसी भी रेलवे ट्रैक की मियाद अधिकतम दस साल होती है और यह ट्रैक वर्ष 2007 में बिछाया गया था। मतलब, इसकी मियाद खत्म हो चुकी है। स्टेशन डायरेक्टर डॉ. जितेंद्र कुमार ने बताया कि यह ट्रैक चिह्नित है, जिसे अतिशीघ्र बदला जाना है। इसके लिए पटरी की मांग की गई है। फिलहाल इस रेल खंड में ट्रेन की गति 50 किमी. प्रति घंटा निश्चित कर दी गई है। इसी रफ्तार से संचालन किया जा रहा है।

सैकड़ों जॉगर प्लेटें खोल रहीं पोल

अब यह जानिए कि दोनों ट्रैक कितने खतरनाक स्थिति में हैं। जानकारों के मुताबिक एक पटरी की लंबाई 13 मीटर होती है और 13-13 मीटर की चार पटरियों को जोड़कर एक स्लैब तैयार होता है। एक स्लैब को दूसरे स्लैब को फिश प्लेटों के जरिए जोड़ा जाता है। इसके बीच में रेल फ्रैक्चर होता है तो उक्त स्थान को जोड़कर मजबूती के लिए जॉगर प्लेट लगा दी जाती हैं। हम जिस ट्रैक की बात कर रहे हैं, उसमें सवा किमी0 के दायरे में सैकड़ों की संख्या में जॉगर प्लेटें लगी हैं। यह साबित करता है कि ट्रैक में बार-बार फ्रैक्चर हो रहा है। कई हिस्से में पटरी में जंग भी लगा है।

लाल निशान बता रहा खतरा

पिछले दिनों ट्रैक चेक करने आई मशीन ने जॉगर प्लेट वाले 50 फीसद से अधिक ज्वाइंट प्वांइटों को खतरनाक माना है। इन पर लाल रंग के निशान भी लगा दिए गए हैं। यह निशान भी दर्जनों की संख्या में हैं।

बदलने के लिए मांगी पटरियां

पटरी बदलने का कार्य जल्द से जल्द होना चहिए। इस बात को अफसर भी मानते हैं, उन्होंने पटरियां उपलब्ध कराने के लिए मुख्यालय को पत्र भी भेजा है। हालांकि पटरियां कब मिलेंगी अभी कह पाना मुश्किल है।

फॉग सेफ्टी डिवाइस से ड्राइवरों का मोहभंग

पिछले साल उत्तर मध्य रेलवे में प्रयोग के तौर पर लाई गई फॉग सेफ्टी डिवाइस को लेकर ड्राइवर, सहमत नहीं है। यह डिवाइस जीपीएस के जरिए कोहरे के दौरान सिग्नल की जानकारी देने में सहायक है। मगर लोको पायलट इस डिवाइस को साथ ले जाने को तैयार नहीं है। उनके मुताबिक पहले से ही लगभग तीस किलो भार रहता है, डिवाइस के नाम पर चार किलो बोझ और लादने के लिए उन पर दबाव डाला जा रहा है। यह डिवाइस प्रयोग में लानी है तो इंजन तक इसे पहुंचाने की जिम्मेदारी भी रेलवे ही उठाए। इसके साथ ही उनका दूसरा तर्क भी है। ड्राइवरों को निर्देश दिए गए हैं कि डिवाइस पर विश्वास न करें। ट्रेन चलाते समय अपने विवेक से काम लें। ड्राइवरों का कहना है कि जो डिवाइस विश्वसनीय ही नहीं है, उसका बोझ उठाने का क्या फायदा। मौजूदा समय में लगभग 40 फीसद ड्राइवर ही इस डिवाइस का प्रयोग कर रहे हैं।




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