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सोमवार, 15 जनवरी 2018

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने डीजीपी को दिया आदेश, सुनीता व मुन्नी पोट्टम की शिकायत पर व्यक्तिगत जांच व उनकी गरिमा की रक्षा करें

बीजापुर 15 जनवरी 2018 (जावेद अख्तर). पीयूसीएल छग ने निष्पक्ष जांच और दोनों साहसी लड़कियों के जान व गरिमा की सुरक्षा की मांग की है। बस्तर के आदिवासियों पर सुरक्षाबल व पुलिस द्वारा मानव अधिकारों के लगातार हनन के खिलाफ कोर्चोली गांव, थाना गंगलूर, जिला बीजापुर, छग की 02 आदिवासी युवती, क्रमशः सुनीता पोट्टम (20 वर्ष) पिता आयतु पोट्टम एवं मुन्नी पोट्टम (19 वर्ष) पिता स्व. बुदू पोट्टम लोकतांत्रिक तरीके से आवाज़ उठा रही हैं। उन पर पुलिस की धमकियों और प्रताड़ना को संज्ञान में लेते हुए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 11. 01.2018 को आदेश जारी किया है। 


वर्ष 2016 में सुनीता और मुन्नी पोट्टम ने डब्ल्यू.एस.एस. (यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) के साथ मिलकर बिलासपुर उच्च न्यायालय में, बीजापुर में हुए 6 फर्जी मुठभेड़ों के मुद्दे पर जनहित याचिका लगाई थी। उसके बाद से वे अपने क्षेत्र में महिलाओं के साथ हो रहे शारीरिक व यौन हिंसा के खिलाफ उनकी लड़ाई में उनका साथ दे रही हैं। 27 दिसंबर 2017 को उन दोनों पर लगातार हो रहे पुलिसिया दमन की एक गंभीर कड़ी तब जुड़ी, जब उनको दो बार अलग-अलग पुलिस और सी.आर.पी.एफ. अफसरों ने धमकियां दीं कि अगर वे इन मुद्दों को उठाती रहेंगी और पुलिस से जवाबदारी मांगती रहेंगी तो उन पर फर्जी नक्सली आरोप डालकर गिरफ्तार किया जाएगा। एस.पी. एन.के. अहिरे और ए.एस.पी. मोहित गर्ग ने उनको यह भी कहा कि उनके द्वारा लगाए गए जनहित याचिका के कारण पुलिस को काफी परेशानी हो रही थी, और उन पर नक्सलियों से मिलीभगत करने के बेबुनियाद आरोप लगाए। 
   
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से गुहार -
10 जनवरी 2018 को अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते हुए सुनीता और मुन्नी पोट्टम मानव अधिकार आयोग, दिल्ली पहुंची। इन युवतियों पर पुलिस के लगातार दबाव के बारे में पहले भी 09 अप्रैल 2016 को मानव अधिकार आयोग के समक्ष एक शिकायत दर्ज की गयी थी, जिस पर आयोग ने युवतियों को उनकी सुरक्षा का आश्वासन दिया था और उनका कथन दर्ज करने के लिए नोटिस भेजा था। दोनों ने आयोग के समक्ष पेश होकर अपने कथन में 27 दिसंबर 2017 की घटना का विवरण देते हुए अपनी सुरक्षा की आस प्रकट की।
  
आयोग ने दिया आदेश छग डीजीपी को -
फलस्वरूप मानव अधिकार आयोग ने दिनांक 11.01.2018 को डिप्यूटी सुप्रीटेंडेंट आफ पुलिस (डी.जी.पी.) छग को आदेश जारी किया है कि वे 'मामले की व्यक्तिगत रूप से जांच करे और जिला पुलिस अधिकारियों को उचित निर्देश जारी करे ताकि पीड़िताओं को उनके जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करने वाले किसी भी तरह के उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़े'।
     
न्याय पालिका से है आस -
मुन्नी पोट्टम और सुनीता पोट्टम की सुरक्षा को लेकर एक अन्तरिम आवेदन, फर्जी मुठभेड़ के केस में, सर्वोच्च न्यायालय में भी दिनांक 10. 01.2018 को लगाया गया। मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने आवेदन को 5.02.2018 को सुनवाई हेतु रखा है। उन्होंने यह भी आदेशित किया कि इस आवेदन की सुनवाई 'नंदिनी सुन्दर व अन्य' की जनहित याचिका के साथ की जाये।
    
दोनों की सुरक्षा के लिए पीयूसीएल ने की मांग -
पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ (पी.यू.सी.एल.) छतीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ लाखन सिंह और महासचिव एडवोकेट सुधा भारद्वाज ने सुनीता और मुन्नी पोट्टम के जान माल एवं गरिमा को सुरक्षा प्रदान करने की मांग प्रेस विज्ञप्ति जारी कर की है। उन्होंने कहा कि बस्तर के हालात सुरक्षा बलों और पुलिस के अत्याचार के कारण दिन ब दिन खराब होते जा रहे। राज्य सरकार आदिवासी समुदाय की सुरक्षा को लेकर उदासीन बनी हुई है, फर्जी मुठभेड़, मानव हनन और अत्याचारों के पचासों मामले सामने आने के बाद भी राज्य सरकार निष्क्रिय बनी हुई है, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं हाईकोर्ट द्वारा दी गई कई बार समझाईश एवं फटकार का भी कोई असर नहीं पड़ा है, जिसके कारण इस तरह के मामलों में वृद्धि होती जा रही है।
   
पांचवी अनुसूची क्षेत्र में अधिनियम बने मजाक -
पांचवीं अनुसूची में होने के बावजूद भी आदिवासी समुदाय एवं उनकी रीति-रिवाजों व परंपरा के साथ राज्य सरकार लगातार छेड़छाड़ कर रही और जबरिया जमीनों का अधिग्रहण कर रही। उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों को लाभान्वित कर खुद के निजी स्वार्थ व फायदे की पूर्ति के लिए राज्य सरकार आदिवासियों पर कहर ढा रही, सैकड़ों गांव जबरिया खाली करा लिए गए, हजारों आदिवासी पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिए गए। आज वे खानाबदोश जीवन यापन करने विवश हैं। ऐसे में न्याय पालिका के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है यहां के निवासियों के पास, क्योंकि राज्य सरकार असंवेदनशील एवं तानाशाही पर उतारू है। परंतु न्याय पालिका तक पहुंच भी गये तो भी जान पर बन आती है इसीलिए दोनों साहसी लड़कियों को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं हाईकोर्ट की शरण में जाकर फर्जी मुठभेड़ मामलों की जांच कराने की और अपनी जान माल की सुरक्षा की मांग की जरूरत पड़ गई है।
   
आदिवासी समुदाय संकटग्रस्त -
इससे ये तो समझा ही जा सकता है कि इन क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय कितना सुरक्षित है और उनके इतिहास को संरक्षित करने के लिए सरकार क्या प्रयास कर रही है। अरबों खरबों का बजट खर्च करने के बाद भी हालात बद से बदतर है। इतना सब खतरा होने के बाद भी यहां के निवासी अपने मूल, पहचान, परंपरा और रीति-रिवाजों को बचाने के लिए प्रयासरत है और सभी तरह की लड़ाई लड़ रहे हैं। पीयूसीएल सदैव आदिवासियों के खिलाफ हो रहे दमन और अत्याचार के विरूद्ध न्याय के लिए आवाज़ उठा रहा है। 

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