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शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

सरकार की नई शर्त के खिलाफ शिक्षाकर्मियों ने जताया विरोध

रायपुर 15 दिसंबर 2017 (जावेद अख्तर). शिक्षाकर्मियों को भविष्य में सरकार पर दबाव बनाने के लिए हड़ताल जैसा कदम उठाने से रोकने के लिए जारी किए गए आदेश के विरोध में शिक्षाकर्मियों में रोष व्याप्त हो गया है। शिक्षाकर्मियों ने एक स्वर में कहा है कि वे सरकार के इस आदेश का विरोध करेंगे। इस मामले में शिक्षाकर्मी नेताओं ने इस नए आदेश का विरोध किया है और इसे शिक्षाकर्मियों की आवाज दबाने के लिए सरकार का षड़यंत्र करार दिया है।

सरकार ने जोड़ी एक नई शर्त - 
ज्ञात हो कि जशपुर में शिक्षाकर्मी के 298 पदों पर निकाली गई भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों को जिला पंचायत द्वारा नियुक्ति पत्र भेजा गया। नियुक्ति पत्र की कंडिका-4 में सरकार द्वारा एक नई शर्त जोड़ी गई थी जिसके अनुसार शिक्षक (पंचायत) संवर्ग भविष्य में कभी हड़ताल नहीं कर पाएंगे। कंडिका में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (आचरण) नियम 1998 के नियम 5 (दो) में प्रावधान अनुसार- "कोई भी पंचायत सेवर अपनी सेवा या किसी अन्य पंचायत सेवक की सेवा से संबंधित किसी मामले के संबंध में ना तो किसी तरह की हड़ताल का सहारा लेगा और ना ही किसी प्रकार से उसे अभिप्रेरित करेगा"। नवनियुक्त शिक्षाकर्मियों को इस बात का निर्देश दिया गया है कि उन तमाम 12 शर्तों के साथ 25 दिसंबर तक बीईओ के कार्यालय में वो 10 रुपये के स्टांप पेपर पर अपना शपथ पत्र प्रस्तुत करें। जशपुर में जिन 298 शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति हुई है। उनमें 8 पद- भूगोल, 28 पद- रसायन, अंग्रेजी - 68, भौतिकी- 60, जीव विज्ञान-18, गणित- 94, वाणिज्य के 15 पदों पर शिक्षाकर्मी की नियुक्ति शामिल हैं।

शिक्षाकर्मियों ने की थी हड़ताल - 
विदित हो कि संविलियन सहित अपनी 9 मांगों को लेकर करीब 1 लाख 80 हजार शिक्षाकर्मी 20 नवम्बर से हड़ताल पर चले गए थे। करीब 15 दिनों की हड़ताल से स्कूलों में पढ़ाई ठप्प हो गई थी। इस बीच जिला और जनपद पंचायतों ने कई शिक्षाकर्मियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की। प्रदर्शन के दौरान सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। वहीं, छत्तीसगढ़ बंद के एक दिन पहले ही बिना शर्त अपनी हड़ताल खत्म कर दी। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि मई तक कमेटी शिक्षाकर्मियों की मांगों पर विचार कर उनकी मांगों को पूरा करेगी। एक समझौते के बाद 5 दिसम्बर को शिक्षाकर्मी काम पर लौटे।

सरकार का तर्क मनमानी रोकने जोड़ी शर्त - 
शिक्षाकर्मियों द्वारा अपनी मांगें पूरी कराने हड़ताल पर चले जाने के कारण बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा था। वहीं सरकार की भी परेशानी काफी बढ़ गई थी। हालांकि यह शर्त नियमावली में पहले से ही थी, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया था। शिक्षाकर्मियों की मनमानी को रोकने सरकार ने यह कदम उठाया है।

शिक्षाकर्मी नेताओं ने जताया विरोध - 
शिक्षाकर्मी नेता विरेन्द्र दुबे ने इसे सरकार का षड़यंत्र करार दिया है। उन्होंने कहा है कि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी मिली है। सरकार द्वारा यह शिक्षाकर्मियों की खबर को दबाने की कोशिश की गई है। जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं। शिक्षाकर्मियों की छोटी-छोटी बहुत सी समस्याएं हैं जिनमें समय पर वेतन नहीं मिलना है, कई-कई महीने हमें वेतन नहीं दिया जाता। इस तरह की समस्याएं को सरकार के सामने रखने के लिए हमारे पास एक मात्र यही रास्ता है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह षड़यंत्र है हमारी आवाज दबाने के लिए। हम इस आदेश का विरोध करेंगे अगर सरकार ने हमारी आवाज को दबाने की कोशिश की तो हम कोर्ट की शरण लेंगे। 

सरकार का तुगलकी फरमान - 
शिक्षाकर्मी नेता संजय शर्मा ने इस आदेश को तुगलकी आदेश बताते हुए कहा है कि हम ऐसे तुगलकी फरमान से नहीं डरते हैं। उन्होंने कहा है कि हमारी पहले से सेवा शर्तों में उसका उल्लेख है उसी शर्त को आधार बना कर सरकार हमारे ऊपर निलंबन और बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई करती है। सरकार अगर सोचती है कि इस तरह के आदेश से शिक्षाकर्मी डर जाएंगे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। शिक्षाकर्मी तभी आंदोलन करते हैं जब उनकी जरूरतों की अवहेलना की जाती है, उनकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है या फिर उनके साथ अन्याय होता है। इस तरह की शर्तें सभी शासकीय सेवाओं में रहती है उसके बावजूद अपनी मागों के लिए सब हड़ताल करते हैं। सभी को अभिव्यक्ति की आजादी संविधान ने दिया है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ेगी तो हम हड़ताल भी करेंगे और कोर्ट का दरवाजा भी खटखटायेंगें। 

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