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शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

दीपावली के त्यौहार पर नक़ली दूध, मावा का धंधा शुरू

अल्हागंज 14 अक्टूबर 2017. दीपावली का त्यौहार  नजदीक आ रहा है। इस अवसर पर दूध, मावा, पनीर की भरपूर आपूर्ति करने के लिए मिलावटखोरों नये नये हथकंडे अपनाना शुरू कर दिया है। ग्रामीण अंचलों में दूध, मावा, पनीर, देशी घी का धंधा करने वाले दूधियों के पास एक भी भैंस नहीं है। लेकिन सीजन पर इनके पास हर समय 400 से 500 लीटर तक नकली दूध उपलब्ध रहता है। 


वैसे नकली दूध की बिक्री बाज़ार मे धडल्ले से बराबर होती रहती है। जिसे मिलावटखोर दूधिये बाज़ार में आपूर्ति करते हैं। इसके अलावा जलालाबाद, फरुँखाबाद, राजेपुर, कलान, मिर्जापुर, जरियनपुर, ढाईघाट आदि कस्बाई बाजारों में केनों में भरभर कर ले जाया जाता है। ये दूध सफेद पोस्टर कलर, खाद्य तेल, ईनो पाउडर, रिफाइंड तेल, तथा सूखा दूध पाउडर का मिश्रण करके बनाया जाता है। इस दूध में झाग के साथ-साथ फैट भी होता है। जिसे आम उपभोक्ता समझ नहीं सकता है। 

इसके उपयोग से लीवर और किडनी के जल्दी खराब होने की आशंका लगी रहती है। इसी प्रकार मावा, सूखा दूध पाउडर, रिफाइंड पोस्टर कलर  के साथ-साथ केमिकल का भी उपयोग करके मावा तैयार किया जाता है। इसका स्वाद असली मावा से काफी भिन्न होता है। इसी क्रम में नकली पनीर भी बनाकर बाजार में बेचा जाता है। जिससे बंगाली मिठाईयां जैसे - छेना, दिलबहार, काला जामुन, लौज जैसी कई प्रकार की मिठाईयां बनाई जाती है। इन मिठाईयों की सबसे ज्यादा त्यौहारी माँग होती है। जिसके लिए कच्चे माल की आपूर्ति दो सप्ताह से पहले ही शुरू कर दी जाती है। 

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मिलावटखोर आम जनता के साथ-साथ बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की टीम इस पर ध्यान नहीं  देती। इस विभाग के अधिकारियों के चहेरे त्यौहारों पर बाजार मे दिखाई पडते है। जो मिलावटखोरों के यहां जाकर त्यौहारी बक्शीश लेकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते है। उन्हें आम जनता व बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा से कोई लेना देना नहीं होता है। उन्हें दिखाई देती है तो वो है बक्शीश।

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