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शुक्रवार, 16 जून 2017

मंदसोर प्रकरण - मुख्‍यमंत्री के सचिव एस.के मिश्रा पर हत्या का प्रकरण दर्ज करने हेतु हाईकोर्ट में याचिका पेश

भोपाल 15 जून 2017 (जावेद अख्तर).  मंदसोर में 6 किसानों की हत्या का मामला दिन पर दिन गरमाता जा रहा है, इस मामले को लेकर आज एक पत्रकार ने मामले में हत्या का प्रकरण दर्ज करने के लिए इंदौर हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत कर आरोपियों के खिलाफ 302 का मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करने की माँग की है। बताते चलें कि पुलिस ने हिंसा फैलाने के मामले में अब तक 102 लोगों को हिरासत में लिया है।

प्रस्तुत याचिका में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सचिव एस.के. मिश्रा के निर्देश पर मंदसौर के एस.पी ओपी त्रिपाठी ने गोली चलाने के आदेश दिए थे। जिस पर पुलिस प्रशासन ने निहत्थे आंदोलनरत किसानों के ऊपर गोलियों की बौछार कर उन लोगों को लाशों के ढेर में बदल दिया, सोची-समझी राजनीति के पीछे हत्या करवाने के षड्यंत्र के खिलाफ हत्या का प्रकरण दर्ज करने हेतु याचिका प्रस्तुत की गई है। याचिका में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा इस मामले में 1-1 करोड़ रूपए की मुआवजा राशि बांटने की घोषणा पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है, क्योंकि सरकार और प्रशासन ने खुद ही मारे गए लोगों की, जो रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है, उसमें मारे गए लोगों को किसान के बजाये तस्कर बताया गया था। ऐसे मैं इन लोगों के परिजनों को एक एक करोड़ की राशि दिया जाना उचित नहीं होगा इस पर रोक लगाई जाये। पुलिस यह साबित करे कि मारे गए लोग किसान नहीं बल्कि तस्कर थे? जबकि याचिकाकर्ता का कहना है कि जिनको गोलियां लगी वह सभी स्थानीय किसान थे, मगर पुलिस ने सीधे गोली मारी और रिपोर्ट में तस्कर दर्ज किया है। 

याचिकाकर्ता ने की जल्द सुनवाई की मांग - 
उक्त याचिका को याचिकाकर्ता अवधेश भार्गव की ओर से अधिवक्ता यावर खान ने पेश की। शीघ्र सुनवाई की माँग निवेदन पर न्यायालय में प्रकरण की सुनवाई सोमवार तक करने हेतु नियत की है। याचिका दायर होते ही एक बार फिर से मंदसौर में पुलिस फायरिंग पर सवाल उठ खड़े हुए हैं कि आखिरकार निहत्थों पर फायरिंग कर क्या साबित करना चाहते हैं? संभावना जताई जा रही है कि शिवराज सिंह चौहान बंदूक और प्रशासन के दम पर पूरे एमपी को खामोश कराने की इच्छा रखते हैं जबकि फायरिंग में 6 किसानों की मौत हो गई थी। इस दुखद घटना के अगले दिन शिवराज सिंह चौहान के उपवास रखने के पीछे की मंशा इस घटना की असलियत को छुपाना है, ताकि मीडिया और सभी का ध्यान उपवास के कार्यक्रम की ओर हो जाए तथा अधिक से अधिक सबूतों को खत्म किया जा सके। परंतु याचिकाकर्ता ने कहा है कि आंदोलन पर आंसू गैस और लाठीचार्ज कर काबू किया जा सकता था मगर फिर भी पुलिस को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सचिव पीके मिश्रा द्वारा गोली चलाने के आदेश दे दिया। 

गोलीकांड पर पहले क्या बोली थी सरकार ?
गोलीकांड के दिन भूपेंद्र सिंह ने कहा था कि किसानों पर पुलिस और सीआरपीएफ ने गोली नहीं चलाई। सीएम ने जब ज्यूडिशियल इन्क्वायरी का एलान किया,  तब भी वे इस बारे में कुछ बोलने को तैयार नहीं थे। मंदसौर कलेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह ने तो यह तक कह दिया था कि गोली किसने चलाई, इसका खुलासा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही हो सकता है। 

गृहमंत्री ने स्वीकारा पांच किसानों की मौत - 
मंदसौर में हुए गोलीकांड के तीसरे दिन सरकार ने यू-टर्न ले लिया। गुरुवार को गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने पुलिस फायरिंग में ही 5 किसानों की मौत होने की बात मान ली।

मारे गए किसानों की सूची - 
पांच किसान और एक 17 साल के किसान पुत्र की मौत पुलिस की गोली से हुई है और सारा मीडिया 5 किसानों की मौत की बात कर रहा है जो टेक्नीकल रूप से ठीक है क्योंकि वो बालक किसान नहीं बल्कि किसान का नाबालिग पुत्र था।
           
मृतकों के नाम -
कन्हैयालाल पाटीदार- किसान 
बबलू पाटीदार - किसान 
चैनराम पाटीदार - किसान 
सत्यनारायण - किसान 
आरिफ - किसान 
अभिषेक - कॉलेज छात्र (किसान पुत्र) - उम्र 17 वर्ष 

मीडिया की भूमिका सवालों के घेरे में - 
ये व्यस्क की श्रेणी में नहीं आएगा इसीलिए टीवी चैनलों से इस किसान पुत्र का नाम गायब है। कमाल की रिपोर्टिंग है टीवी चैनलों की। नाबालिग का उल्लेख सिर्फ इसलिए नहीं किया गया क्योंकि शिवराज सिंह चौहान के लिए बड़ी मुसीबत बन जाती और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हस्तक्षेप करता इसीलिए सभी चैनलों ने नाबालिग किसान पुत्र की चर्चा तक नहीं की। इससे समझ सकते हैं कि मेन स्‍ट्रीम मीडिया पर कितने प्रतिशत विश्वास किया जा सकता है और उनके द्वारा गला फाड़कर ब्रेकिंग न्यूज़ का तड़का लगाकर क्या परोसा जाता है। ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि मीडिया के टीवी न्यूज़ चैनलों की कार्यप्रणाली और कार्यशैली सत्तापक्ष की ओर ज्यादा झुकी होती है और वह सत्ताधारी पार्टी के बताए अनुसार काफी कुछ प्रसारित कर रहे।

यहां हुई सरकार से चूक - 
मंदसौर में किसान आंदोलन से निपटने में एडमिनिस्ट्रेशन की खामी सामने आई है। वहीं हिंसा भड़कने के बाद प्रदेश सरकार हरकत में आई और राजधानी में बैठकों का दौर शुरू हुआ। मंगलवार को मुख्यमंत्री की अगुआई में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि जिले के कलेक्टर और एसपी को हटाया जाए। मगर देर शाम तक केवल इस पर ही चर्चा होती रही कि स्वतंत्र कुमार सिंह और एसपी ओपी त्रिपाठी के स्थान पर किसे भेजा जाए। बहरहाल फैसला नहीं हो पाने की ही वजह थी कि बुधवार को जब कलेक्टर मृतकों के परिजनों को सांत्वना देने पहुंचे तो उन्हें भागना पड़, बाद में गुरुवार सुबह सरकार ने दोनों अफसरों का तबादला किया।

ऐसे भड़की हिंसा - 
मंदसौर और पिपलियामंडी के बीच बही पार्श्वनाथ फोरलेन पर मंगलवार सुबह 11.30 बजे एक हजार से ज्यादा किसान सड़कों पर उतर आए। पहले चक्का जाम करने की कोशिश की। पुलिस ने सख्ती दिखाई तो पथराव शुरू कर दिया। पुलिस किसानों के बीच घिर गई। किसानों का आरोप है कि सीआरपीएफ और पुलिस ने बिना वॉर्निंग दिए फायरिंग शुरू कर दी। इसमें 6 लोगों की मौत हो गई। दरसअल, मंदसौर में कलेक्टर स्वतंत्र सिंह और एसपी ओपी त्रिपाठी ने यह फैसला लिया था कि 2014 बैच के प्रोबेशनर आईपीएस साईं कृष्णा को सीआरपीएफ की टुकड़ी के साथ भेजा जाए। कृष्णा आंदोलनकारियों के बेकाबू होने के बाद हालात संभाल नहीं पाए। बताया जा रहा है कि इसी दौरान सीआरपीएफ ने एक के बाद एक तीन फायर किए। इससे तीन लोगों की मौत हो गई। दरअसल आंदोलनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सीआरपीएफ की टोली उनके पीछे भागी। खदेड़ते समय टोली दो टुकड़ों में बंट गई। एक टुकड़ी का आंदोलनकारियों से आमना-सामना हो गया और सीआरपीएफ ने गोली चला दी। जैसे ही तीन लोगों की मौत की खबर फैली, आंदोलनकारी उग्र हो गए। उस समय थाने में बमुश्किल एक दर्जन पुलिसकर्मी ही मौजूद थे, जिन्होंने हालात को बेकाबू होता देख फायरिंग शुरू कर दी। एक ही दिन में घटी इन दो घटनाओं ने आग में घी का काम किया, जिसके चलते बुधवार को आधा मालवा सुलग उठा। 

सोशल मीडिया के चलते भड़की हिंसा - 
आईटी विभाग ने कहा है कि हाल में जितनी भी जगहों पर दंगे बलवा हुए उसे भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका सोशल मीडिया की रही है क्योंकि लगभग अस्सी प्रतिशत पोस्ट भ्रामक और झूठे थे जिसमें तमाम तरह के ऐसे तथ्य दिए गए जो सच नहीं थे इसलिए सोशल मीडिया आग में घी डालने का काम कर रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह के संदेश प्रसारित कर रहे हैं, उससे भी हिंसा भड़कने के साथ उग्र हो गया। 

आंदोलन की आग सात जिलों में भड़की - 
मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन में फैली हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। विरोध प्रदर्शन प्रदेश के 7 जिलों तक फैल गया है। मंदसौर, नीमच, देवास, उज्जैन के बाद शाजापुर में भी वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।गुरुवार को शाजापुर कृषि मंडी में एक ट्रक और चार मोटर साइकिलों में आग लगा दी।  इतना ही नहीं आंदोलन कारियों ने शाजापुर के एसडीएम राजेश यादव के साथ मारपीट भी की, इसमें उनके पैर की हड्डी टूट गई और वह अस्पताल में भर्ती हैं। वहीं देवास में भी आगजनी की घटनाएं हुईं।



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