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सोमवार, 29 मई 2017

छत्तीसगढ़ में शासन प्रशासन की तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाना बड़ा गुनाह - वर्षा डोंगरे

रायपुर 28 मई 2017 (जावेद अख्तर). निलंबित जेल अधिकारी वर्षा डोंगरे ने कहा है कि उसका अपराध सिर्फ इतना है कि उसने निर्दोष आदिवासियों की बात सोशल मीडिया के जरिये उठाई। डोंगरे ने यह भी कहा है कि वह निलंबन आदेश के खिलाफ संवैधानिक ढांचे के भीतर कार्रवाई करेंगी। एक राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक समाचार-पत्र को ई-मेल के माध्यम से दिए गए साक्षात्कार में जवाब देते हुए वर्षा डोंगरे ने यह बातें कहीं।


छग में राज्य सरकार पहले से ही आदिवासी समुदाय पर अत्याचार और फर्जी मुठभेड़ को लेकर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं संस्थाओं के निशाने पर है। वहीं हाईकोर्ट में भी कई याचिकाएं दायर हुई जिनमें राज्य सरकार से जवाब तलबी के लिए नोटिसे भेजीं जा चुकीं हैं। इससे समझा जा सकता है कि प्रदेश में सरकार की कार्यप्रणाली पूरी तरह से संदेहास्पद बनी हुई है और सरकार द्वारा लिए अधिकांश फैसले एकपक्षीय या तानाशाही जैसे हैं। राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक समाचार-पत्र को ई-मेल के माध्यम से दिए गए साक्षात्कार में जवाब देते हुए वर्षा डोंगरे ने यह बातें कही है। 

   
साक्षात्कार के प्रमुख अंश :-

वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आपको समय दिए जाने के बावजूद उनके नोटिस का जवाब नहीं दिया। अदालत में अपने निलंबन से लड़ने का इरादा रखती हैं ?

निलंबन की अवधि में मुझे अंबिकापुर जेल में संलग्न किया गया है। बीते 2 मई को, मुझे जवाब देने के लिए 2 दिन दिया गया था, साथ ही 32-पृष्ठों की एक नोटिस दी गई थी, चूंकि मैं अस्वस्थ थी, मैंने रायपुर में केंद्रीय जेल अधिकारियों को बताया और घर छोड़ दिया, मुझे बिस्तर पर आराम करने की सलाह दी गई। घर पर रहकर मैंने 376 पृष्ठ का उत्तर तैयार किया, जिसे मैंने जेल अधिकारियों को 5 मई को स्पीड पोस्ट से प्रस्तुत किया। इस तरह से जवाब तो दिया है। अब हम संवैधानिक ढांचे के भीतर इस निलंबन आदेश के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।


वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आप सामाजिक मीडिया के दिशा-निर्देशों के बारे में जानती थीं लेकिन आपने जानबूझकर उल्लंघन किया
मैंने फेसबुक पर पूरी जागरूकता, अपनी समझ के साथ लिखी हूँ एवं संविधान द्वारा मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मेरे मौलिक अधिकार को ध्यान में रखते हुए विचार व्यक्त किए। मैंने सिविल सेवा के दिशानिर्देशों का पालन किया है जितना संभव हो, मैंने गोपनीय वस्तुओं, विभागीय जानकारी या महत्वपूर्ण दस्तावेजों को कभी साझा नहीं किया और न ही बताया। लोक-सेवकों के रूप में, यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम न केवल सार्वजनिक सेवा करें बल्कि लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करें। यह मेरा प्रसिद्धि पाने का इरादा नहीं था। यह दावा किया जा रहा है कि छग सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी सामाजिक मीडिया दिशा-निर्देशों के तहत मेरे खिलाफ कार्रवाई की गई है। मेरा यह विरोध सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर आधारित है। मेरी पोस्ट सार्वजनिक सेवा आचरण नियम-1965 के भीतर है।


अपने पोस्ट में आपने कहा था कि आपके पास इस बात के साक्ष्य हैं कि युवा आदिवासी लड़कियों को यातना दी गई, बिजली झटके दिए जाने के प्रमाण, कहां देखा आपने ?
अपने कार्यकाल के दौरान जगदलपुर के केंद्रीय जेल में मैंने देखा जब वहां युवा आदिवासी लड़कियों को लाया गया। मुझे उन बच्चों से पता चला कि सभी महिला पुलिसकर्मियों को पुलिस स्टेशन छोड़ने के लिए पूछने के बाद, उनकी कलाई और स्तनों पर बिजली झटके दिए गए, जबकि वे नग्न थीं। ये जले हुए निशान मैंने खुद देखें हैं। इन लड़कियों के तीसरे दर्जे ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया। हमारे संविधान और कानून किसी को यातना का अधिकार नहीं देते हैं।


बस्तर में राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ आपने बात की। बस्तर में हिंसा कैसे खत्म हो सकती है ?
एक पूंजीवादी व्यवस्था को बलपूर्वक स्थापित किया जाना बस्तर में समस्या को बढ़ा दे रहा, जो हिंसा के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता है। बस्तर की समस्या सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक है, जिसे जमीनी स्तर पर हल किया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 244(ए) के तहत, आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन पर स्वामित्व अधिकार दिए जाने चाहिए। पांचवीं अनुसूची सभी आदिवासी इलाकों में लागू की जानी चाहिए। खनिज संपदा और उनके अधिकारों पर हमला कर, राज्य सरकार कुछेक बड़े उद्योगपतियों के लिए, उनके वास्तविक विकास की प्रक्रिया को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।


आप उन लोगों में से एक हैं जिन्होंने 2006 में राज्य के सार्वजनिक सेवा आयोग के खिलाफ मामला दायर किया था, जो आपने जीता था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुना जा रहा है -

उच्च न्यायालय के फैसले में, हर चरण में राज्य सरकार को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। 07 जून 2016 को, सरकार और आयोग हमें पदोन्नति और पदों का लालच देकर मामले को बंद करना चाहते थे, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया। इसलिए यह स्पष्ट है कि यह भी मुझे प्रताड़ित करने के कारणों में से एक हो सकता है। लेकिन मुझे लगता है कि आदिवासियों को यातना दिए जाने के मामले को उठाना और आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के अधिकारों के खिलाफ उठाए गए कदमों को सामने लाना प्राथमिक कारण है। 


सोशल मीडिया पर नियमों को तोड़ने वाले अनेक अधिकारियों के खिलाफ सरकार ने कार्रवाई नहीं की है, पर आपके साथ की गई क्यों
मुझे भी आश्चर्य है कि जो अधिकारी सार्वजनिक सुरक्षा को नजरअंदाज करते हैं, वे सोशल मीडिया पर गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी करते हैं, जिनमें से एक अधिकारी तो आदिवासी घरों को जलाना भी स्वीकार करता है, उनके खिलाफ कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं की गई। सरकार ही इसका बेहतर जवाब दे सकती है। शायद मेरा अपराध केवल यही है कि मैंने निर्दोष जनजातियों की सुरक्षा के लिए बात की और उनके संवैधानिक संरक्षण के बारे में बात की।


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