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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

कस्टम नीति के खिलाफ़ राइस मिलर्स का आह्वान, प्रदेश की राईस मिलों में 10 नवंबर से बंदी का ऐलान

छत्तीसगढ़ 14 अक्टूबर 2016 (छत्तीसगढ़ ब्यूरो). छत्तीसगढ़ मेें सर्राफा व दवा विक्रेताओं के बाद अब राइस मिल मालिकों की नाराज़गी, सरकार की कस्टम मिलिंग नीति के खिलाफ़ बढ़ती जा रही है और व्यापारियों मेें भी खासा आक्रोश व्याप्त होता जा रहा है। राइस मिलर्स का कहना है कि कुछेक अधिकारियों ने सरकार को गुमराह कर व अंधेरे मेें रख कर यह अतार्किक नीति की मंजूरी ले ली है।
अगर यह नीति लागू रहती है तो प्रदेश मेें एक भी राइस मिल नहीं चलाई जा सकेगी क्योंकि इस नीति से राइस मिलर्स को घर से या मार्केट से पैसा उधार लेकर मिल चलवाना पड़ जाएगा। घाटे मेें कौन राइस मिल चलाना चाहेगा। इस नीति के अन्तर्गत चलाने पर एकाध महीने मेें ही राइस मिल कर्ज़े मेें डूब जाएगी और संचालक को नीलाम कर पैसा भरना पड़ जाएगा। इसलिए कोई भी व्यापारी इस नीति के अन्तर्गत चलाने के लिए तैयार ही नहीं है।
  
मांग माने, नहीं तो अघोषित बंदी -
कस्टम मिलिंग की दर पूर्ववत रखने, बारदाने के मूल्य में की गई कटौती वापस करने सहित चार सूत्रीय मांगों को लेकर प्रदेश के राइस मिलरों ने आगामी 10 नवम्बर से राइस मिल बंद रखने का निर्णय लिया है। मंडियों में धान की खरीदी भी नहीं करेंगे। जरूरत पड़ने पर बिजली कनेक्शन कटवा देंगे। 21 अक्टूबर को सभी जिलों में कलेक्टरों को ज्ञापन सौंपा जाएगा। जब तक मांग पूरी नहीं होगी, तब तक मिलें चालू नहीं की जाएगी।

अयोग्य व अपात्र सरकार की बढ़ा रहे मुसीबतें -
सरकार अपनी ही नीतियों व फेरबदल मेें उलझती नज़र आ रही है। अयोग्य व अपात्रों को जब उच्च पदों पर, आम सहमति के बिना, बैठा दिया जाता है तो परिणाम ऐसेे ही प्राप्त होतें हैं, ऐसेे अयोग्य पदाधिकारी सरकार का तेल निकाल कर रख देंते। सरकार अभी भी समझना नहीं चाहती है, इसमें सरकार की ही मटियामेट होगी क्योंकि ऐसेे अनैतिक व एकपक्षीय निर्णय पूरी सरकार को डुबान की ओर ले जा रही है।
 
बैठक मेें फूटा गुस्सा -
बहरहाल प्रदेश राइस मिल एसोसिएशन की बुधवार को राजधानी में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया राज्य सरकार की नई कस्टम मिलिंग की नीति के खिलाफ मिलरों में काफी गुस्सा था। उनका कहना था नुकसान उठाकर कस्टम मिलिंग नहीं करेंगे। उनका आरोप था कि अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को गुमराह कर यह नीति लागू की है।

चार सूत्रीय मांग -
कस्टम मिलिंग की दर पूर्ववत 40 रुपए प्रति क्विंटल रखने,
बारदाना की कटौती 16 रुपए प्रति नग करने या दुबारा उपयोग की अनुमति देने,
परिवहन विसंगति दूर करने व
मंडी से धान खरीदी टैक्स में छूट देने
पर बैठक में रायशुमारी की गई।

आमसभा में प्रदेश भर से आए राइस मिलर्स ने शासन की खरीफ विपणन वर्ष 2016-17 की कस्टम मिलिंग में बारदाना नीति, कस्टम मिलिंग दर, परिवहन दर, एवं झड़ती प्रतिशत को लेकर जमकर भड़ास निकाली। इस दौरान आक्रोशित मिलरों ने एक मत से निर्णय लिया गया कि उन्हें अधिक आर्थिक नुकसान होगा, इससे मिलों को चला पाना संभव नहीं है।

कस्टम मिलिंग नीति तर्कसंगत नहीं -
बैठक के संबंध में एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं महासचिव ने बताया कि शासन द्वारा ऐसी नीति बनाई गई, जिसमें मिलर्स को काम करना संभव नहीं है। पिछले 15 सालों में अरवा कस्टम मिलिंग की दर को 40 रुपए प्रति क्विंटल से कम नहीं किया गया है। 40 रुपए से घटाकर 25 रुपए किया जाना तर्कसंगत नहीं है। मिलर्स से वर्ष 2015-16 में बचत बारदानों पर 23-57 पैसा की एकपक्षीय कटौती की गई, जिसमें मिलर्स को प्रति नग लगभग 13 रुपए  का नुकसान हुआ। इस वर्ष बढ़ाकर 32-37 पैसा कर दिया गया है। भारत शासन की नीति के तहत राज्य सरकार को भरती बारदाने के उपयोग पर 38+38 कुल 76 प्रतिशत डेपरीसिएशन की राशि मिलती है। पूर्व में परिवहन संबंधी सुझाव को वर्ष 2016-17 की नीति में लागू किए जाने का ठोस आश्वासन दिया गया था। पूर्व वर्ष में मिलर्स को जहां 50 किमी से धान उठाव पर यदि 30 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहा था, तो 100 किमी के धान उठाव पर 0.10 की दरें स्वीकृत की गई, जो जायज में नहीं है। अरवा तथा उसना में वर्तमान स्थिति में झड़ती प्रतिशत क्रमश: 67 एवं 68 प्रतिशत प्राप्त नहीं होता है। भारत शासन द्वारा 1993-94 में वर्षों पूर्व लैब में जांच किए गए निष्कर्षों पर आधारित है। जिसमें छग से कोई जांच नहीं की गई थी।

एसोसिएशन का मानना है कि प्रांत की कृषि उपज में आने वाले झड़ती प्रतिशत के अनुसार चावल का झड़ती प्रतिशत निर्धारित होना चाहिए। प्री सेल चावल का कारोबार करने वाले राईस मिलरों से कहा गया है कि वे शीघ्र ही अपना स्टाक खत्म कर ले ताकि उन्हें परेशानी न हो। बैठक में प्रमुख रूप से अध्यक्ष योगेश अग्रवाल, देवराज व त्रिलोक चंद सांखला, महावीर, मोहन, पूनम व मनोज अग्रवाल, प्रमोद, विजाय, रोशन, कैलाश, सर्वेश, मनीष व  किशन खंडेलवाल आदि उपस्थित थे।

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