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सोमवार, 19 सितंबर 2016

नक्सलवाद के खिलाफ़ उमड़ा जनसैलाब, छग मेें हुयी अब तक की सबसे विशाल रैली


छत्तीसगढ़ 19 सितंबर 2016 (जावेद अख्तर). बस्तर मुख्यालय में नक्सलियों के खिलाफ 60 हजार से अधिक आदिवासी एवं अन्य लोगों ने जब नक्सल व नक्सलियों के खिलाफ़ नारा बुलंद किया तो ज़मीन से लेकर अंबर तक सब कुछ हिल गया। यह विशाल रैली अपने आप मेें ही ऐतिहासिक हो गई क्योंकि आज से पहले प्रदेश मेें नक्सलवाद के विरूद्ध इतने व्यापक स्तर पर खिलाफ़त नहीं की गई थी।

एक अन्य लिहाज़ से भी यह रैली अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इस रैली में पुरूषों के साथ ही महिलाओं की संख्या भी काफी अधिक रही। हैरानी इस बात की हुई कि रैली में निम्न व बेहद गरीब तबके के मज़दूर वर्ग व स्थानीय किसानों की भी तादाद अधिक रही, वहीं क्षेत्र मेें शिक्षा से जागरूकता आई है इसका प्रमाण यह रहा कि पांचवीं कक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट तक के छात्र व छात्राओं का भी हुजूम रैली मेें शामिल हुआ। जबकि अगर वर्ष 2010 के दौर मेें देखें तो उस दौरान बस्तर की सत्तर फीसदी आवाम का समर्थन नक्सलियों के प्रति था और सरकार व सुरक्षा बलों के खिलाफ़त मेें खड़े रहतें थे मगर पांच वर्ष मेें ही बस्तर की पूरी तस्वीर बदलती दिख रही है और अब वर्ष 2016 मेें बस्तर की सत्तर फीसदी आवाम नक्सलियों के खिलाफ़ उठ खड़ी हुई है।

यह एक सार्थक परिवर्तन है जो कि लोकतंत्र की बहाली का इशारा कर रहा है। बीते डेढ़ वर्षों के दौरान नक्सलियों ने कई ऐसे बस्तरियों की हत्या कर दी जो कि सीधे साधे व साधारण लोग थे और बस्तर क्षेत्र मेें सामाजिक जागरूकता का कार्य शांति व संविधान के अनुरूप कर रहे थे और वह भी नि:स्वार्थ की भावना से। नक्सलियों को यह बात नहीं हज़म हो रही थी कि क्षेत्र के निवासियों को जागरूक किया जाए एवं अपने वास्तविक अधिकारों को जान सकें, इसी कारणवश कई ऐसे सज्जन सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या करके नक्सली सबक सिखाने व लोगों मेें भय व्याप्त करने की आशा करतें थें परंतु परिणाम प्राप्त हुआ बिल्कुल ही उलट, नि: स्वार्थ की भावना से काम कर रहे सज्जन सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या से आम नागरिकों के भीतर नक्सलवाद के प्रति नज़रिया बदल दिया और आम नागरिक भीतर भीतर आंदोलित होने लगे और खिलाफ़त की आग सुलगने लगी, एक न एक दिन बड़ा धमाका होना ही था और पल रहा गुस्सा बाहर आना ही था। परिणाम स्वरूप 17 सितंबर 2016 को बस्तर की आवाम ने नक्सल व नक्सलियों के खिलाफ़ विशाल रैली निकाल दी और जमकर नारेबाज़ी भी हुई।
    
गूंज रहे थे नारे -
बस्तर को बचाना है, नक्सलियों को भगाना है, सरकार को भी होश में लाना है, इनको भी जगाना है, नक्सलवाद मुर्दाबाद जैसे गगगभेदी नारों से आज शहर का समूचा वातावरण गुंजायमान हो उठा। प्रदर्शनकारियों में नक्सलियों के खिलाफ भारी आक्रोश एवं घृणा का लावा उबलता दिखायी पड़ा तो वहीं सुरक्षा बलों द्वारा दिए गए जख्मों के चलते गुस्सा भी स्पष्ट दिखाई दिया। संभवत: बस्तर के इतिहास में ऐसा पहला मौका है, जब बस्तरवासियों ने नक्सलियों के खिलाफ खुलकर अपनी आवाज बुलंद की और उन्हें ललकारा है वो भी इतनी अधिक आम नागरिकों की भीड़ ने।
 
तख्तियों पर लिखी खिलाफ़त की बात -
ललकार रैली में प्रदर्शनकारी तख्तियां भी थामे हुए थे, जिनमें लिखा था कि -

बस्तर ने यह ठाना है,
नक्सलवाद मिटाना है!
अब होंगे सारे सपने साकार
बस्तरवासी करेंगे ललकार!
नक्सलवाद का होगा नाश
बस्तर का होगा विकास!
कसम शहीदों की खाते हैं
नक्सलवाद मिटाएंगे!
नक्सली छोड़ भागेंगे हथियार
देख के बस्तर की ललकार!
बस्तर ने यह भी ठाना है
सरकार को जगाना है!
गर न जागी राज्य सरकार
सिखाएंगे सबक इस बार!
शहीदों के सम्मान में
सर्वसमाज मैदान में!
खौफ-जुल्म और अत्याचार
नक्सलियों का यही व्यवहार!
  नक्सलवाद मुर्दाबाद !!
  
प्रमुख मार्गों से गुजरी ललकार रैली -
ललकार रैली हाता मैदान से पैलेस रोड होते हुए दंतेश्वरी मंदिर पहुंची, यहां पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी, तत्पश्चात सीरासार, गोलबाजार, स्टेंट बैंक चौक से चांदनी चौक होते हुए अस्पताल मार्ग से रैली वापस हाता मैदान पहुंची। रैली का नेतृत्व अग्रि के आनंद मोहन मिश्रा, सोयम मुक्का, अवधेश गौतम कर रहे थे तथा सुरक्षा व्यवस्था को आईजी एसआरपी कल्लूरी व एसपी आरएन दाश देख रहे थे।

रैली में जगदलपुर जिले के अलावा सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव समेत संभाग के विभिन्न जिलों से करीब 60 हजार से अधिक लोग शामिल हुए। रैली में बस्तर के सभी वर्ग, समुदाय, संगठन एवं 65 समाज के लोगों ने हिस्सेदारी निभायी। इस दौरान अलग-अलग स्थानों से आए लोग छोटी-छोटी रैलियों की शक्ल में आयोजन स्थल पहुंचे। हाता ग्राऊंड में लोग परम्परागत वेशभूषा में नाचते-गाते हुए पहुंच रहे थे। बस्तरवासिसयों में गजब का उत्साह परिलक्षित हो रहा था।

चाक-चौबंद थी सुरक्षा व्यवस्था -
आयोजन के मद्देनजर सुरक्षा के तगड़े प्रबंध किए गए थे, प्वार्इंट चिन्हित किए गए थे, जहां जवानों की तैनाती रही। सादे वेश में पुलिस कर्मचारी शहर के चप्पे-चप्पे की निगरानी कर रहे थे। वरिष्ठ अधिकारी स्वयं कमान संभाले हुए थे। आयोजन के दौरान पूरे शहर पर गिद्ध सी निगाह बनाए रखने के लिए, पुलिस ने दो ड्रोन और 4 चापरों के जरिए वीडियो रिकार्डिंग करवायी।
 
नक्सलियों से उकताने का परिणाम -
दरअसल सिद्धांतविहीन हो चुके नक्सलियों की मानवता को शर्मसार करने वाली घटनाओं को समूचे बस्तरवासियों ने भोगा और महसूस किया है परिणाम स्वरूप सभी समाज प्रमुखों, वकीलों, व्यापारियों, स्वयंसेवी संगठनों, राजनीतिज्ञों ने सड़क पर उतरकर नक्सलवाद के अस्तित्व को नकारते हुए यह संकेत दिया है कि, वे बस्तर से नक्सलवाद के खात्मे के साथ-साथ शांति और विकास के पक्षधर हैं। बस्तरवासी चाहता है कि बस्तर के पहुंचविहीन इलाकों में निवासरत अंतिम व्यक्ति तक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचें। आज नक्सलियों की खुली खिलाफत से सरकार और पुलिस का मनोबल भी बढ़ा है।
  
स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा आज का दिन -
बस्तर में आज प्रजातंत्र का स्वर्णिम दिन मनाया गया। यह दिन इतिहास के पन्ने में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा, क्योंकि पूरा बस्तर माओवादियों को ललकारने के लिए सड़क पर उतर पड़ा। आस बंधी है कि इस विरोध के बाद बस्तर की फिजा में नक्सलवाद का घुला हुआ जहर कम होगा। ग्रामीणों के मन से जहां माओवादियों का भय कम होगा और समाज की जागरूकता से उनका हौसला बढ़ेगा। वहीं बस्तर से निकलने वाला संदेश देश भर के लिए नक्सलवाद और आतंकवाद का बैरोमीटर बनने की संभावना है। यह पहला मौका है समूचे बस्तरवासी तन-मन-धन से माओवादियों की खिलाफत करने वाले एक्सन ग्रुप फॉर नेशनल इंटेग्रिटी अग्रि को अपना खुला समर्थन दे रहे हैं। आज शहर में जलसे जैसा माहौल देखा गया, मानो कि किसी राष्ट्रीय पर्व की तैयारी चल रही हो।

सेना और पुलिस को स्वतंत्रता दी जाए - मिश्रा
अग्रि के राष्ट्रीय संयोजक आनंद मोहन मिश्रा ने कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ हम जनता को विश्वास में लेकर केन्द्र व राज्य सरकार को यह जनादेश देना चाहते हैं, कि हमारी सेना और पुलिस बल को स्वतंत्रता दी जाए। बात-बात में माओवाद पोषित संस्थाओं द्वारा अड़ंगे लगाए जाते हैं, हम उसे खारिज करते हैं। हम आव्हान करते हैं कि बस्तर के विषय में कोई भी निर्णय दिल्ली या रायपुर की बजाए बस्तर में ही लिए जाएं। उल्लेखनीय है कि विगत 22 दिसंबर 2015 को भी सामाजिक एकता मंच के बैनर तले बस्तरवासियों ने नक्सलियों के विरोध में धिक्कार रैली निकालकर प्रदर्शन किया था, जिसमें 10 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे।
     
राज्य की भाजपा सरकार पर भी गुस्सा फूटा -
बस्तर के कई वरिष्‍ठ व सम्मानित व्यक्तियों ने राज्य सरकार पर गुस्सा निकालते हुए कहा कि राज्य सरकार को यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि आदिवासी समाज के बिना भी सत्ता हासिल किया जा सकता है। सरकार जिस तरह से बस्तर मेें आदिवासियों के प्रति हिटलरशाही अपनाए हुए है इससे बाज़ आ जाए तो ही बेहतर होगा अन्यथा आगामी चुनाव मेें कई दिग्गजों की जमानत जब्त हो जाएगी। यह रैली स्थानीय निवासियों पर किए जा रहे जुल्म व अत्याचार के खिलाफ़ है, फिर चाहे वो नक्सलियों द्वारा किया जा रहा हो या फिर राज्य सरकार द्वारा। आदिवासी समाज अब जागरूक व एक हो गया है इसलिए नक्सलियों के अलावा राज्य की भाजपा सरकार के लिए भी यह एक इशारा है कि समय रहते खुद से खुद मेें सुधार कर लें अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहें। कई आम नागरिकों ने भी कहा कि राज्य की भाजपा सरकार आदिवासी समाज को अनदेखा करने की गलती कर रही है, इस नज़रिए को बदलने की दरकार है वरना न कुर्सी न रहेगी और न ही बचेगी सरकार। स्थानीय महिलाओं व महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह बातें भी कही कि आगमी चुनाव मेें धन या उपहार के आधार पर मतदान नहीं किया जाएगा बल्कि जो वास्तविक रूप मेें बस्तर की व्यवस्था को बहाल करना चाहता है सिर्फ उसी उम्मीदवार को वोट दिया जाएगा और न ही जाति वर्ग व रंग के आधार पर दिया जाएगा। इसलिए अगर राज्य की भाजपा सरकार को चौथी बार भी सत्ता हासिल करना है तो सर्वप्रथम आदिवासी समाज की सुनवाई करे, गैर आदिवासियों द्वारा हमारी भूमियों पर कब्ज़ा कर लिया गया है, उन पर कानूनी रूप से कार्यवाही किया जाए और ऐसे बेजा कब्ज़ेदारों यानि भू माफियाओं को हवालात व जेल पहुंचाया जाना चाहिए।

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