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गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

छत्तीसगढ़ में नहीं थम रहा मौतों का सिलसिला, एक के बाद एक लगातार हो रहा हमला




दंतेवाड़ा/छग 7 April 2016 (जावेद अख्तर). केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) का मानना है कि दंतेवाड़ा में घातक बारूदी सुरंग विस्फोट में शहीद होने वाले उसके कर्मियों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी ''लीक'' हुई थी और उसने ऐसे जासूस का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। अर्धसैन्य बल का मानना है कि यह जासूस इस बल के 'भीतर का भी हो सकता है और बाहर का भी।'


सीआरपीएफ महानिदेशक के. दुर्गा प्रसाद ने खुलासा टीवी को बताया कि, यह तय है कि उनकी आवाजाही से जुड़ी जानकारी लीक हुई थी। कहीं न कहीं या किसी न किसी स्तर पर ऐसा हुआ है। जवानों की आवाजाही औचक और अभियान से परे की थी और इसलिए वे सादे कपड़ों में थे। हम इसकी बारीकी से जांच कर रहे हैं। नक्सलियों द्वारा किए गए घातक बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के सात जवान शहीद हो गए थे। माओवादी हिंसा से बेहद प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में इस विस्फोट के कारण सड़क पर चार फुट गहरा गड्ढा हो गया था।

छत्तीसगढ़ महानिदेशक मेलावाड़ा गांव के पास विस्फोट स्थल पर गए। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 230वीं बटालियन के ये जवान टाटा 407 में सवार होकर दंतेवाड़ा से सुकमा मार्ग में अपनी कंपनी के दूसरे शिविर में जा रहे थे। जब वाहन मेलावाड़ा गांव के पास कुआकोंडा थाना क्षेत्र में पहुंचा, तब नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर दिया। इससे वाहन पूरी तरह उड़ गया और इसमें बैठे सात जवान शहीद हो गए। उन्होंने कहा कि ये एक सरप्राइज मूवमेंट था जिसकी खबर नक्सलियों को लग गई। नक्सलियों ने धमाके में घायल तीन सीआरपीएफ जवान को बाद में एके 47 से गोली मार दी। धमाके के लिए नक्सलियों ने करीब 50 किलो विस्फोटक का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि एसओपी में बदलाव किया जाए या नहीं ये तो जांच के बाद ही तय होगा।
   
ताड़मेटला के शहीदों को नमन :-
"कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर ना आये" देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से बस्तर क्षेत्र में आज भी जिंदा है तमाम चुनोतियां और इसका डट कर मुकाबला करने वाली भारतीय अर्धसेना के लिए आज 6 अप्रैल 2010 का दिन विशुद्ध रूप से "काला-दिवस" कहा जा सकता है. आज ही के दिन बस्तर के सुकमा जिले के ताड़मेटला क्षेत्र में हज़ार से अधिक की संख्या में बर्बर हथियारबन्द लाल आतंकियों के कायराना हमले में सीआरपीएफ (CRPF) के 76 जाबांज सिपाही शहीद हुए थे। घंटों चले उक्त मुठभेड़ में नक्सलियों को भी भारी क्षति उठानी पड़ी थी।

* बस्तर में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आकर खुशहाल भविष्य और सुरक्षा के नाम पर अपनी सर्वोच्च शहादत देने वाले ताड़मेटला के 76 जाँबाज़ अमर शहीदों को खुलासा टीवी, आईरा और सलाम छत्तीसगढ़ परिवार कृतज्ञ देशवासियों का सादर नमन सहित भावभीनी श्रद्धांजली..   जय अमर जवान!! जय भारत!!
 
सैकड़ों लोगों की जान बचाने वाले 'स्काउट डाग' के लिए गई सात जवानों की जान :-
छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ का डॉग स्काउट है इसमें से यह एक चर्चित डॉग 'स्काउट' है जिसे बचाने के चक्कर में सात सीआरपीएफ जवानों की जान चली गई। इसे आप संयोग कहें या फिर जवानों की बदकिस्मती कि अब तक जवानों और लोगों की जिदंगी बचाने वाले स्काउट की वजह से जवानों की जान चली गई। दरअसल साढ़े तीन साल का स्काउट छत्तीसगढ़ के जंगलों में पड़ रही भीषण गर्मी की वजह से बीमार चल रहा था। स्काउट के लिए ही कूलर लाने के लिए जवान गए थे। जब वह लौटने लगे तो नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में बारूदी सुरंग लगाकर वाहन को उड़ा दिया जिससे इन जवानों की मौत हो गई।
   
सूंघने की जबर्दस्त क्षमता :-
सीआरपीएफ का यह डॉग बेल्जियम के मॉलिनॉयस नस्ल का स्निफर डॉग है जिसमें सूंघने की जबरदस्त क्षमता है। दो साल से यह इसी इलाके में तैनात है। करीब हफ्ते भर पहले इसे गर्मी के चलते लू लग गई थी। स्थानीय स्तर पर इसकी तबियत को दुरुस्त करने की कोशिश हुई लेकिन बाद में डॉक्टरों ने कह दिया कि इसके लिए कूलर की जरूरत है। अब भी यह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं है लेकिन हालत में सुधार है। उम्मीद है दो-चार दिनों में पूरी तरह फिट होकर अपनी ड्यूटी पर लौट आएगा।

छत्तीसगढ़ में तैनात हैं 150 बेल्जियम के मॉलिनॉयस स्निफर डॉग :-
सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट दीपेन्द्र सिंह राजपूत ने कहा कि अब तक स्काउट ने सैकड़ों लोगों की जान बचाई है। 20 से ज्यादा आईईडी की पहचान की है। हालत यह है कि इसके बगैर नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन की बात तो दूर कहीं मूवमेंट तक नहीं कर सकते हैं। सीआरपीएफ के पास ऐसे 350 डॉग्स हैं। इसमें से करीब 150 तो छत्तीसगढ़ में ही तैनात हैं।
   
भाजयुमो नेता मुरलीकृष्ण नायडू को मारी गोली हालात स्थिर - रवि अग्रवाल
बीजापुर के भैरमगढ़ के दुर्गा मंदिर में नक्सलियों ने भजायुमो नेता मुरलीकृष्ण नायडू की पीठ और कमर में गोली मार कर दी। हमले का सीसीटीवी फुटेज सामने आया। फुटेज में तीन संदिग्ध नक्सलियों को मुरली कृष्ण नायडू को गोली मारते देखा जा सकता है। 2 अप्रैल की शाम बीजेपी की युवा ईकाई के नेता मुरली कृष्ण नायडू अपने घर के पास के मंदिर में, अपने समर्थकों के साथ पूजा कर रहे थे, जब 3 लोग मंदिर में घुसे और उन पर गोलियां बरसाईं। यह अत्यंत क्रूर हमला था क्योंकि नक्सलियों ने पहले गोली मारी और फिर कुल्हाड़ी से भी वार कर दिया जिससे वह वहीं पर अचेत अवस्था में गिर पड़ें थे। चीख पुकार सुनकर लोगों की भीड़ जमा हो गई, इलाज के लिए तत्काल जगदलपुर अस्पताल रवाना किया गया जहाँ से उन्हें रायपुर रिफर कर दिया गया। मुरली नायडू के कंधे और कमर में गोलियां लगी हैं और रायपुर के रामकृष्ण केअर हास्पिटल में उनका इलाज चल रहा है। वहीं 19 अप्रैल को नायडू का विवाह होने वाला था और शादी के कार्ड तक बांटे जा चुके हैं। महेश गागड़ा पर बड़े हमले की नक्सलियों ने धमकी दी थी, जिसके बाद उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गयी थी।

* रायपुर वन मंत्री महेश गागड़ा ने खुलासा टीवी के संवाददाता से कहा की नक्सली कायर और डरपोक होतें हैं इसीलिए तो ऐसे लोगों को निशाना बना रहें हैं जो इनका सामना नहीं कर सकता है। जब मुझे धमकी दिए थे तो क्यों मेरे पर अटैक नहीं करते, मेरे आदमियों पर क्यों करते हैं"।
         

तीर मारकर सीआरपीएफ के जवान को किया घायल - (संदीप श्रीवास्तव)
18 मार्च को भी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में अलग-अलग नक्सली घटनाओं में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के दो जवान घायल हो गए हैं।  जिले के कुआकोंडा थाना क्षेत्र के अंतर्गत ऐटेपाल गांव के करीब प्रेशर बम की चपेट में आने से सीआरपीएफ की 206 कोबरा बटालियन का जवान रमेश बेहरा घायल हो गया है। घायल जवान को बाहर निकाल कर उपचार के लिए हास्पिटल में भर्ती करा दिया गया। दूसरी घटना भी कुआकोंडा थाना क्षेत्र के अंतर्गत चिकपाल गांव के करीब गश्त पर निकले जवानों पर नक्सलियों ने तीर चला दिया। इस हमले में सीआरपीएफ की 195 वीं बटालियन का जवान नवीन कुमार घायल हो गया है।

*  जिले में प्रेशर बम की चपेट में आने से सीआरपीएफ का एक जवान घायल हो गया, वहीं नक्सलियों ने तीर मारकर एक जवान को घायल कर दिया। हमलावर नक्सलियों की खोज की जा रही है। - कमलोचन कश्यप, पुलिस अधीक्षक, दंतेवाड़ा
    
बस्तर में समस्या सबसे ज्यादा गंभीर :-
सीआरपीएफ के मुताबिक, छतीसगढ़ के बस्तर इलाके में ये समस्या सबसे ज्यादा गंभीर है क्योंकि बस्तर तेलंगाना, ओडिशा और महाराष्ट्र की सीमा से जुड़ा है। इस इलाके में सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। अकेले छतीसगढ़ में करीब 600 हार्डकोर नक्सली सक्रिय हैं जो सीआरपीएफ के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। पिछले साल जहां 904 आइईडी हमले हुए थे, इस साल सितंबर तक ही 1303 हमले हो चुके हैं। छतीसगढ़ को छोड़कर बाकी सभी प्रभावित राज्यों में सीआरपीएफ को नक्सलियों को लेकर खुफिया जानकारी मिल रही है जिससे उनके खिलाफ कार्रवाई करना अब आसान हो गया है।
       
इतना अधिक खूनखराबा से हासिल क्या हुआ :-
सैकड़ों सिपाहियों व नक्सलियों की मौत के बावजूद भी आज तक बस्तर के हालात नहीं बदले हैं। दोनों ओर से जानें जा रहीं हैं। प्रत्येक दिन कोई न कोई घटना घट रही है। छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने के दस वर्षों में जितना खूनखराबा बस्तर में नहीं हुआ उससे कई गुना अधिक खूनाखच्चर विगत तीन वर्षो में हो चुका है परंतु परिणाम क्या प्राप्त हुआ? कुछ भी नहीं, आज भी हालात जस के तस बने हैं।तो आगे भी इससे क्या फायदा मिलना है। विगत पंद्रह सोलह वर्षों से सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच में बस्तर का बेगुनाह आम आदमी पिस रहा है, और दोनों ही तरफ से इन बेगुनाहों को मारा जा रहा है। सुरक्षा बल, नक्सलियों का समर्थक कह कर मार रहें हैं तो नक्सली, पुलिस का मुखबिर कह कर मार रही है। वास्तविक रूप में देखा जाए तो बस्तर के हालात इराक, सीरिया जैसा ही हो गया है। सरकार अपनी पर अड़ी हुई है और नक्सली अपनी पर। सरकार और नक्सल के बीच में चल रही टकराव का खामियाजा सुरक्षा बलों और बस्तर के आम नागरिकों को जान देकर चुकाना पड़ रहा है। दो के दोनों ही खुदगर्जी के चलते इंसानित के दुश्मन बने हुए हैं।

सरकार तो अपनी नीतियों को लेकर इतनी अधिक गंभीर है कि सैकड़ों बस्तर वासियों की बलि चढ़ा दी गई और हजारों बेगुनाह बस्तर वासियों को जेल में ठूंस दिया गया है। अपने हक की मांग करना बस्तर में कितना खतरनाक हो सकता है इसका कोई कयास तक नहीं लगा सकता है। शायद तानाशाही से भी भयानक हालात से रूबरू होना चाहते हैं तो एक बार बस्तर का दौरा जरूर करें। सारा मानवाधिकार धरा का धरा रह जाएगा और नियमों की बात करना बहुत बड़े मजाक से कम नहीं, और बस्तर में जिंदगी इतनी सस्ती है कि जितना कि पान ठेले पर गुटखा। कहां, कब और कैसे नक्सली बताकर खोपड़ी में तीन इंच का होल कर दिया जाएगा कि आपको अहसास तक नहीं हो पाएगा। जब तक अहसास होगा तब तक में आपके प्राण आपकी काया से निकल भी चुका होगा। ऐसा अत्यंत खतरनाक अहसास को महसूस करने की इच्छा रखतें हैं तो बस्तर का भ्रमण अवश्य करें।खाने योग्य भोजन का आभाव, पीने योग्य साफ पानी का अभाव, महिलाओं के पास वस्त्रों का अभाव, रोजगार का अभाव, शिक्षा का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, बिजली, सड़क, परिवहन व नहरों का अभाव और अन्य संसाधनों का भी अभाव है। ऐसे बदतर हालातों में भी यहाँ के लोग जिंदादिली के साथ जीवन बिता रहें है। यह बात भी अपने आप में आश्चर्य चकित कर देती है।

मदर इंडिया का गीत याद आ गया "दुनिया में हम आयें हैं तो जीना ही पड़ेगा, जहर है गर ये जिंदगी तो भी पीना ही पड़ेगा"।

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