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शनिवार, 16 अप्रैल 2016

छत्तीसगढ़ - जंगली हाथियों के आतंक से ग्रामीण त्रस्‍त, वन विभाग कर्मी कमाई में मस्‍त

धरमजयगढ़/छत्तीसगढ़ (छग ब्यूरो/रवि अग्रवाल). जंगली हाथियों से पीडि़त विजयनगर ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम टेढ़ासेमेर के पहाड़ी कोरवा समुदाय के ग्रामीणों ने रायगढ़ की कलेक्टर श्रीमती अलरमेल मंगई डी के जनदर्शन में पहुंचकर अपना दुखड़ा सुनाया और सहयोग व सहायता की मांग रखी। विदित हो कि दो माह पूर्व जंगली हाथियों ने 48 पहाड़ी कोरवा परिवार के घरों को तोड़फोड़ कर नष्ट कर दिया था जिससे ग्रामीणों में दहशत व्याप्त है।
प्राप्‍त जानकारी के अनुसार भारती कामगार संघ अध्यक्ष तथा समाजसेवी असलम एवं विजयनगर से माण्डप्रवाह के सक्रिय प्रतिनिधि संजय जी के नेतृत्व में टेढ़ासेमेर के मजबूर, लाचार और परेशान पहाड़ी कोरवा समुदाय के 35 परिवारों के लोग अपनी फरियाद लेकर कलेक्टर के दर पर पहुंचऔर कलेक्टर को ज्ञापन देकर अपनी समस्या से रूबरू कराया। विगत दो माह पूर्व जंगली हाथियों ने 48 पहाड़ी कोरवा परिवार के घरों को तोड़फोड़ कर नष्ट कर दिया, ऐसे में विशेष पिछड़ी जनजाति के लोग जानवरों की भांति पेड़ के नीचे खुले आसमान तले जीवन जीने को मजबूर है। जैसे तैसे गुजर बसर कर रहे ये लोग मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह से वंचित है। उन्होंने कलेक्टर के समक्ष यह मजबूरी रखी कि वन विभाग के द्वारा दिए जाने वाला मुआवजा पर्याप्त नहीं है। इससे न ही घर की मरम्मत करवाई जा सकती है और न ही पुनः से जीवन यापन और न ही रोजगार शुरू किया जा सकता है।

रायगढ़ जिले में हाथियों का आतंक बदस्तूर जारी, लोग दहशत में जीने को मजबूर -
रायगढ़ जिले में इन दिनों जंगली हाथीयों की आवाजाही बढ़ने से लोग दहशत के साये में जीने के लिए मजबूर हैं। पिछले 1 माह से लगातार रायगढ़ के बंगुरसिया, धर्मजयगढ़ कापू के दाहिदाढ़, टेड़ासेमर सहित कुड़ेकेला आदि ग्रामीण इलाकों में लगातार हाथियों का झुंड देखने में आ रहा है, इन हाथियों के द्वारा दर्जनों पहाड़ी कोरवा परिवार के घरों को भी उजाड़ दिया गया है। अब हाथी जंगल छोड़ गांवों की तरफ रुख कर रहे हैं जिससे ग्रामीणों में दहशत व्याप्त है। जंगली हाथी घर, वाहन तोड़ दे रहे हैं और बार बार ग्रामीणों की फसल भी नष्ट कर दे रहे हैं और ऐसा कई मर्तबा किया भी जा चुका है।  प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार के बचाव की व्यवस्था ग्रामीणों के लिए नहीं की गयी है। विभाग एवं जंगलों में लगने वाली आग के कारण अब हाथियों का समूह कुड़ेकेला, मुनुन्द आदि स्थानों पर दिन में भी मुख्य सड़कों पर दिखाई देने लगा है जिससे यात्रियों में भय का माहौल व्याप्त है।

जब इंसान जंगलों को नष्ट कर देंगे तो हाथियों को मजबूरन ही अपने भोजन पानी एवं रहने के लिए गांवों की तरफ रुख करना पड़ रहा है। करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद भी वन अमला इन जंगली जानवरों के लिए बेहतर रहवास की व्यवस्था नहीं कर सका है नतीजा हाथियों का यह समूह जंगल छोड़ अब गाँवों की तरफ रुख कर रहा है।

हरे पेड़ों की अवैध कटाई में रायगढ़ अव्वल - 
लगातार उद्योगों द्वारा जंगलों की कटाई जिस तेज़ी से की जा रही है, ऊपर से वनों में हरे भरे पेड़ों की अवैध कटाई चरम पर है, रायगढ़ जिले में तो हरे पेड़ों की अवैध कटाई सबसे अधिक हो रही है इसीलिए रायगढ़ जिले में हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ते जा रहे हैं। आरोप है कि रायगढ़ जिले में वन विभाग के वनमंडलाधिकारी व उप वनमंडलाधिकारी दोनों ही अलाली में अग्रणी हैं। जिले में अवैध तरीके से हरे भरे व बड़े पेड़ों की कटाई खुलेआम चल रही है, जिसका प्रमाण जंगली हाथियों का ग्रामीण इलाकों में अधिक आने जाने से समझ सकते हैं। इससे तो संभावना प्रबल है कि जंगलों के घटते एरिये के कारण जल्द ही अन्य कई खतरनाक जंगली जानवर भी गांवों की आबादी क्षेत्रों में पहुंचेंगे ही, यानि आबादी क्षेत्रों में और अधिक नुकसान तथा बच्चों व महिलाओं के लिए जान माल का जबर्दस्त खतरा, स्पष्ट हो रहा है कि हालात अत्यधिक बिगड़ने वाले हैं। ऊपर से वनमंडलाधिकारी की मौन रूपी अघोषित सहमति से लकड़ी तस्करों की रोज़ होली, दीवाली और ईद हो गई है, जितने हरे पेड़ों की अवैध कटाई विगत एक वर्ष में हुई है, उतने अधिक हरे पेड़ तो संभवतः बीते 5-6 वर्षों में नहीं कटे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले के वनमंडलाधिकारी तथा रायगढ़ व तमनार के उप वनमंडलाधिकारी आदि कितने अधिक दयावान व बड़े दिलवाले हैं। विभागीय सूत्रों की माने तो प्रतिदिन सौ से अधिक हरे पेड़ों की बलि चढ़ाई जा रही है। आरोप तो ये भी है कि वनमंडलाधिकारी व अन्य उप वनमंडलाधिकारी, रेंज अधिकारी, डिप्टी रेंजर, फारेस्ट गार्ड आदि सब के सब नोटों की खुशबू से अलमस्त होकर कुम्भकर्ण वाली लंबी नींद में घुस गए हैं। स्‍थानीय लोगों का कहना है कि वन विभाग का हजारों से अधिक का अमला है मगर जाने किस बिल में दुपक गया है कि दिखाई ही नहीं देता है।

विधायक भी गायब - 
लोगों का आरोप है कि यहां के स्थानीय नेता व विधायक तो जाने किस रोग से ग्रस्त हैं कि इन्हें रायगढ़ में कहीं भी भ्रष्टाचार न तो दिखाई देता है और न ही सुनाई देता है, संभवतः ये कुम्भकर्ण के चेले बन गए है। कई हादसे हो चुके हैं मगर फिर भी विधायक ने इन गरीब आदिवासी परिवारों की सुध लेने की आवश्यकता नहीं समझी। रायगढ़ विधायक ने छत्तीसगढ़ी आदिवासियों से काफी दूरी बना रखी है, यह बात समझ से परे है। इससे पहले भी कई आदिवासी परिवारों की जमीन के मामले में भी रायगढ़ विधायक गरीब आदिवासी परिवारों से दूर ही रहे। मीडिया द्वारा रायगढ़ के आदिवासियों की जमीन को आलोक इंफ्रा द्वारा अवैध तरीके से हड़पने की साजिश का खुलासा कर दिया गया था जिसके चलते मामला सामने आ गया तथा जांच भी शुरू हो गई है, जिसके बाद विधायक ने अपनी नाक बचाने के लिए प्रेसवार्ता करने का दिखावा करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली परंतु एक बार भी गरीब आदिवासी परिवारों से मिलने की आवश्यकता नहीं समझी।

वैसे रायगढ़ के कुछेक लोगों ने बताया कि विधायक और कथित भू माफिया की भी गाढ़ी छनती है। अब ये अफवाह है कि इसमें कुछ सच्चाई है? इस बारे में कह पाना संभव नहीं। रायगढ़ के कई गांवों में हाथियों का कहर जारी है। अभी तक बड़े पैमाने का नुकसान हो चुका है। ग्रामीणों को आशा थी कि वन विभाग का अमला बचाव के लिए आएगा। मगर जहां जहां भी हाथियों द्वारा उत्पात मचाया गया, वहां वहां पर अमला सब कुछ समाप्त होने के बाद ही पहुंचा। वन विभाग कितना अधिक सक्रिय है इससे समझ सकते हैं। लोगों ने जब वन विभाग के अमले की इतनी अधिक सक्रियता देखी तो समझ गए कि ये सभी सिर्फ कागज़ी शेर हैं, कागज़ों में ही सक्रियता दिखाएंगे, सबकुछ बर्बाद होने के बाद ही पहुँचेगें। अब सभी गांव के लोग इकट्ठा होकर अपने परिवार एवं फसलों की रक्षा के लिए खुद से ही रात-जगा कर रहे है। लेकिन आज भी वन विभाग का अमला नदारत है यानि गुमशुदा है। गरीब अपनी गरीबी से तो लड़ाई लड़ ही रहा है उस पर हाथियों ने अलग से कहर ढा दिया है और वन विभाग भी इनकी ही छाती पर बैठकर मूंग दल रहा है, बचाव करने समय से तो आते नहीं। तो क्या शासन प्रशासन को ईमेल करें या वाट्सअप्प करें या फिर रिपोर्ट दर्ज कराएं ताकि समय रहते पतासाजी हो सके।

मुआवजा राशि ऊंट के मुंह में जीरा - 
जंगली हाथियों के उत्पात से लाखों का नुकसान हो रहा है, लाखों के नुकसान के बदले सिर्फ कुछ हज़ार का मुआवजा टिका दिया जाता है। सबसे भयानक आरोप तो ये है कि मुआवजे की रकम पास कराने के लिए, मुआवजे की रकम में से दस फीसदी कमीशन विभाग के लुटेरे कर्मचारियों को देना पड़ रहा है, यह सर्वविदित है कि कमीशन या घूस का एक बड़ा हिस्सा अधिकारियों तक पहुंचाते हैं। वन विभाग अर्थात जंगल का विभाग और रायगढ़ में तो नियम कायदे कानून भी जंगल वाले हो गए हैं। इन्हीं सब कारणों से क्षुब्ध व व्यथित होकर ही गांव वालों का तर्क है कि असली जंगलराज तो यहां पर है। सभी विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के अच्छे दिन की बजाए बहुत अच्छे दिन आ गए हैं। जब भी ऐसी कोई घटना होती है तब ही डीएफओ कहीं न कहीं के दौरे पर होते हैं या बहुत जरूरी मीटिंग में व्यस्त होते हैं। ऐसा इत्तेफाक एकाध बार हो सकता है परंतु हरेक बार ऐसा इत्तेफाक हो तब जाहिर है कि लोगों का दिमाग तो ठनकेगा ही।

धमतरी जिले में भी हाथियों ने मचाया उत्पात - 
वहीं धमतरी में भी तीन चार दिनों से लगातार हाथी का आतंक शुरू है। एक जंगली हाथी रास्ता भटक जाने के कारण धमतरी जिले के रुद्री गांव में घुस गया और लोगों की चीख पुकार से हाथी इधर से उधर भागने लगा। यह देखकर ग्रामीण डर गए। पूरे गांव व आसपास के गांवों में दहशत का माहौल बन गया है। हालांकि यह गलती भी फारेस्ट की टीम से हुई, जिसमें हाथी को जंगल की ओर खदेड़ने का प्रयास कर रहे थे परंतु आपसी तालमेल सही न होने के कारण हाथी जंगल की ओर जाने की बजाए गांव के अंदर तक पहुंच गया। तत्पश्चात सूचना भेजी गई और तब फारेस्ट के वन्य जीव प्राणी शाखा की अतिरिक्त टीम और पुलिस बल को बुलाया गया। इसके बाद काफी लंबी जद्दोजहद के बाद हाथी को जंगल की ओर ले जाया जा सका। हालांकि इसमें आर्थिक रूप से गांव के लोगों का काफी नुकसान हुआ मगर कोई घायल नहीं हुआ।

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