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सोमवार, 25 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ - धान के कटोरे में भी सूखे की मार, किसान हुए बेरहम मौसम के शिकार

छत्तीसगढ़ 25 जनवरी 2016 (जावेद अख्तर). छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी प्रमुख अखबारों ने हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह की किसानों के नाम लिखी एक पाती प्रमुखता से प्रकाशित की। पत्र के रूप में छपे इस सरकारी विज्ञापन में मुख्यमंत्री ने लिखा है ''सूखे खेतों को देखकर दुःख होना स्वाभाविक है, लेकिन संकट की इस घड़ी में हम सबको धैर्य और हिम्मत से काम लेने की जरूरत है, ताकि समस्या का हल मिल जुलकर किया जा सके। परंतु जब आंकड़ों पर नजर डालते हैं तो सूखे के अलावा अन्य समय भी प्रदेश के किसानों ने आत्महत्या की है।


प्राप्‍त आंकड़ों के अनुसार लाख से अधिक किसान खुदकुशी कर चुके हैं। भारत सरकार की नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 2006 से 2010 के बीच हर साल औसतन 1,555 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। यानी छत्तीसगढ़ में हर दिन 4 से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली। इस मामले पर देश भर में सवाल खड़े हुए तो अगले साल यानी 2011 में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा ही शून्य में बदल गया। 2012 में किसानों की आत्महत्या की संख्या केवल 4 बताई गई। 2013 में यह फिर से शून्य हो गई। छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़ों की बाजीगरी को समझने के लिए आपको 2009 के आंकड़े देखने होंगे। 2009 में छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या के 1,802 मामले दर्ज हुए थे, जबकि स्वरोजगार के अन्य वर्ग में यह संख्या 861 थी। 2013 में जब किसानों की आत्महत्या का मामला ज़ीरो बता दिया गया तब स्वरोजगार के मामलों में आत्महत्या की संख्या 2077 हो गई। वर्ष 2014 में 1699 मामले सामने आए तथा वर्ष 2015 में यह आंकड़े गिरकर सिर्फ 480 पर सिमट गया मगर स्वरोजगार के मामलों में आत्महत्या की संख्या पिछले वर्ष 2014 से दो गुना हो गई। अगर आंकड़ों को गौर से देखें तो यह समझा जा सकता है कि सरकार 2009 से लेकर 2015 तक में प्रत्येक वर्ष के अंतराल पर किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को दूसरे स्वरोजगार योजना के आंकड़ों में शामिल कर दे रही है। 

मतलब यह है कि अब सरकार ने किसानों की आत्महत्या को स्वरोजगार की आत्महत्या के आंकड़ों में जोड़ दिया है। सूखे से प्रभावित होने वाला छत्तीसगढ़ कोई अकेला राज्य नहीं है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश भी सूखे से प्रभावित हुए थे मगर छत्तीसगढ़ की बदतर स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राज्य के 27 में से 25 जिलों को राज्य सरकार ने ने सूखा घोषित कर रखा दिया था पर चूंकि छत्तीसगढ़ में धान की फसल ही सबसे प्रमुख है और इसी से जुड़ी है दो रुपये किलो चावल वाली योजना। तो क्या चावल वाले बाबा का जादू अब खत्म हो चुका है या खत्म होने वाला है?

विज्ञापनों में मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने ऐसा दर्शाया है कि मानों सूखे की वजह से ही यह स्थिति निर्मित हो गई अन्यथा पहले ऐसे हालात नहीं थे मगर आंकड़ों की बानगी देखा जाए तो 2009 से लेकर 2015 तक किसान द्वारा आत्मकथाओं का सिलसिला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है और जो कि दिसंबर के आखिरी तक चालू है। विज्ञापन में मुख्यमंत्री ने संदेश दिया है किआपका जीवन आपके परिवार के लिए और हम सब के लिए बहुत कीमती है। अगर आपको किसी भी प्रकार की उलझन महसूस हो रही हो, तो अपने पास के कृषि विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों से अथवा अपने जिले के कलेक्टर से संपर्क करें। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि प्राकृतिक विपदा की इस घड़ी में छत्तीसगढ़ सरकार हर कदम पर हर संभव मदद के लिए आपके साथ है।''

इस पत्र में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 117 तहसीलों को सूखाग्रस्त करने के साथ ही किसानों से संबंधित कुछ घोषणाओं का भी जिक्र किया है। यह उस मुख्यमंत्री की अपील है, जिन्हें कुछ वर्ष पहले दो रुपये किलो चावल की उनकी योजना के कारण 'चाऊर (चावल) वाले बाबा' के नाम से भी नवाजा गया था। पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी जीत के पीछे छत्तीसगढ़ की जन-वितरण प्रणाली को भी एक अहम कारण माना गया था। यहां तक कि अनेक अर्थशास्त्रियों ने दूसरी राज्य सरकारों को छत्तीसगढ़ की पीडीएस नीति को अपनाने की सलाह तक दे डाली थी।

छत्तीसगढ़ के अधिकांश अखबारों में मुख्यमंत्री की यह अपील प्रकाशित होने से सुखद अहसास होता है कि राज्य के प्रति आज भी मुख्यमंत्री गंभीर है और विशेषकर किसानों की स्थिति पर। परन्तु जिस दिन मुख्यमंत्री की यह अपील अखबारों में छपी थी, उसी दिन अखबारों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में किसानों की आत्महत्या से संबंधित कुछ खबरें भी प्रकाशित हुई थीं। इसी दिन मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र राजनांदगांव में, जहां से उनके पुत्र अभिषेक सिंह सांसद भी हैं, राज्य के पांच जिलों के किसानों ने एक बड़ी रैली आयोजित कर अपनी बेबसी की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की थी। इस रैली में पांच हजार से अधिक किसान शामिल हुए थे और इससे तमाम राजनीतिक दलों को दूर रखा गया था। 

ये खबरें बताती हैं कि 'धान के कटोरे' में कैसा तूफान मचा हुआ है 

दिसंबर के आखिरी तक में छत्तीसगढ़ में 18 किसानों की आत्महत्या की खबरें सामने आई हैं। इनमें कर्ज से लदे एक किसान ने बैंक और सूदखोरों के तगादे से परेशान होकर अपनी बेटी की सगाई से ठीक पहले जान दे दी थी। वहीं एक किसान ने धान के कम दाने देख कर सदमे में आकर खुदकुशी कर ली। खुदकुशी करने वाले एक किसान को तीन दिन पहले ही कर्ज का नोटिस मिला था। हालांकि आधिकारिक तौर पर इनमें से किसी की भी पुष्टि किसान आत्महत्या के रूप में नहीं की गई है। भूख से होने वाली मौतों और किसान आत्महत्या के आंकड़ों को लेकर देश की सरकारों का यही रवैया रहा है। मगर यह बात कई बार दोहराई जा चुकी है कि नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद विगत ढाई दशकों के दौरान देश में ढाई लाख से अधिक किसान खुदकुशी कर चुके हैं।
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