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बुधवार, 2 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ - पानी की मांग पर मिली लाठीचार्ज की सौगात, राज्य सरकार के कहर से किसान को मिली मौत

छत्तीसगढ़ 2 सितम्‍बर 2015 ( जावेद अख्तर). छत्तीसगढ़ में गंगरेल बांध से पानी छोड़ने की मांग को लेकर अभनपुर से आंदोलन में शामिल किसान की बुधवार को मौत हो गई है। मृतक किसान आंदोलन में पुलिस द्वारा छोड़े गए आंसू गैस के गोले में घायल हो गया था, जिसे इलाज के लिए रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में भर्ती किया गया था। डॉक्टरों ने इलाज के बाद किसान को छुट्टी दे दी थी, लेकिन किसान की बुधवार को अचानक तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई।इसी मामले को लेकर कांग्रेस भवन मीडिया कक्ष में अभनपुर विधायक धनेंद्र साहू ने पत्रकारों से वार्ता में कहा कि कांग्रेस किसानों के साथ कन्‍धे से कन्‍धा मिला कर खडी है।

प्राप्‍त जानकारी के अनुसार मृतक किसान केजूराम बारले अभनपुर ब्लाक के सलौनी, छछानपैरी गांव का रहने वाला था। गौरतलब हो कि बीते 27 अगस्त को धमतरी के गंगरेल बांध से पानी छोड़ने की मांग को लेकर किसानों ने अभनपुर में जमकर प्रदर्शन किया। बांध के गेट को खोलने की जिद पर अड़े प्रदर्शनकारी किसानों की पुलिस के साथ जमकर झड़प हुई। पुलिस ने किसानों के प्रदर्शन को शांत करने के लिए लाठियां बरसाई और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें करीब दो दर्जन किसान घायल हो गए थे। मेकाहारा के चिकित्सकों के अनुसार, आंसूगैस की प्रतिक्रिया के कारण किसान की मौत हुई है। कई बार आंसू गैस गोले भी काफी घातक साबित हो सकता है संभवतः इस प्रकरण में भी ऐसा ही हुआ है जिसके कारण मौत हो गई।

ऐसे दुखद हालात में राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने कल बयान दिया था कि छत्तीसगढ़ के ग्रह नक्षत्रों की स्थिति बदल रही है इसलिए जल्द ही प्रदेश में मूसलाधार बारिश होगी। इस बात से क्या आशय समझा जाए यही कि किसानों को पानी मांगने का अधिकार ही नहीं है या फिर बांध में जमा पानी पर राज्य के किसानों का कोई अधिकार नहीं है? जब छत्तीसगढ़ प्रदेश के गृहमंत्री ऐसा बयान दे सकते हैं तो फिर सोचिए प्रदेश में राजनीति की क्या स्थिति होगी?

आंदोलनरत किसानों पर लाठीचार्ज और आंसूगैस के गोले छोड़ना किस लिहाज़ से उचित है? जबकि बीते एक दो महीनों से राज्य के किसान भाजपा सरकार से मदद की गुहार लगा रहे थे, सहयोग की आस लगाए बैठे रहे, देखते ही देखते स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही थी मगर राज्य सरकार को समय ही नहीं मिला इन गरीब किसानों की ओर देखने का, उनकी दिक्कतों का निराकरण करने की बजाए राज्य सरकार सिर्फ समीक्षा ही करती रही पूरे दो माह में मगर परिणाम फिर भी शून्य। किसानों को उनके हाल पर मरने के लिए राज्य सरकार ने छोड़ दिया, थक हार कर किसानों ने आंदोलन किया और धरना प्रदर्शन किया। यहाँ पर राज्य सरकार व मंत्रियों को जाकर किसानों को समझाना बुझाना चाहिए था मगर पुलिस प्रशासन को लाठीचार्ज करने का आदेश दे दिया गया था। लाठीचार्ज के साथ किसानों की भीड़ को तितर बितर करने के लिए आंसूगैस के गोले भी दागे गए। जमकर किसानों को पीटा गया। जिसके चलते एक और गरीब किसान की मौत हो गई। क्योंकि अगर लाठीचार्ज न हुआ होता तो आंसू गैस के गोले भी नहीं दागे गए होते, तो शायद केजूराम किसान आज जिंदा होता। मगर अफसोस राज्य सरकार को वोट देकर जिताने और सरकार बनाने में भागीदारी निभाने वाले किसानों में से एक किसान की जान ले ली गई। विचारणीय है कि इस मौत का जिम्मेदार कौन है? वो जो अपना हक मांग रहे थे या फिर जिन्होंने लाठीचार्ज करने का आदेश दिया था? क्या राज्य सरकार इस मौत का हिसाब दे सकती है?

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