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सोमवार, 28 सितंबर 2015

चुनाव इन बिहार, किसकी बनेगी सरकार

पटना 28 सितंबर 2015 (जावेद अख्तर). पटना, मुजफ्फरपुर, सिवान, भागलपुर, दरभंगा आदि स्थानों से प्राप्त हुई सूचनाओं के अनुसार, बिहार के चुनाव का घमासान सिर्फ बिहार तक में ही सीमित नहीं रहा है बल्कि पूरे देश की निगाहें बिहार चुनाव पर टिकी हुई है। क्योंकि अधिकांश बिहार के लोगों के मुताबिक, इस बार भाजपा समर्थित पार्टी का बोलबाला रहेगा और बाकी अन्य इतना अधिक प्रभाव डालने में सफल नहीं होते दिखाई दे रहे हैं।
सबसे अधिक संकटग्रस्त कांग्रेस पार्टी ही दिखाई दे रही है। हालांकि यह सभी आंकड़ें सर्वेक्षण व रूझान पर आधारित है। बिहार का चुनाव इसलिए भी विशेष हो गया है क्योंकि इस बार हर राजनीतिक दल के लिए यह चुनाव केवल जीत हार तक ही सीमित नहीं है बल्कि बिहार के सबसे कद्दावर नेता एवं सफल मुख्यमंत्री माने जा रहे नितीश कुमार के लिए तो जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है। एक प्रकार से यह चुनाव नीतिश कुमार के लिए किसी अग्निपरीक्षा या हाईस्कूल बोर्ड एग्जाम से कम नहीं माना जा रहा है। वास्तविक परिणाम तो चुनाव के बाद मतगणना होने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा। 


सट्टा बाजार में भी चल रहा बिहार चुनाव का घमासान किसी की राह मुश्किल तो राह होगी किसी की आसान
बिहार चुनाव में मचे घमासान में सटोरियों की भी चांदी होने की बातें सामने आई है। क्योंकि चुनावी मौसम के दौरान बिहार चुनाव में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है सट्टा बाजार। बिहार व अन्य स्थानों पर बसे बिहार के निवासियों से प्राप्त जानकारी, सट्टाबाजारों, सटोरियों व अन्य सूत्रों के मुताबिक, इस बार का बिहार चुनाव अब सट्टेबाजों और बुकियों की निगाहों का भी मरकज बना हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिहार विधानसभा के लिए मचे इस घमासान का फयादा उठाने के लिए सट्टेबाज़ सक्रिय हो चुकें हैं। बिहार में कुल 243 विधानसभा क्षेत्रों के चुनावों को लेकर सट्टेबाज़ों की रणनीति व पार्टी के सीटों के मुताबिक भाव तक तय हो चुका है। सट्टाबाजार में भाव को खोल भी दिया गया हैं। इस चुनाव में मचे घमासान से सट्टेबाज़ों ने कुल 25 हजार करोड़ रुपए का सट्टा लगने की उम्मीद जताई जा रही है। सट्टेबाज़ों का मानना है कि यह चुनाव नहीं नोटों की बरसात का मौसम है इसमें आंकड़ों व रूझानों के मुताबिक कांटे की टक्कर रहेगी और संभावना सबसे अधिक एनडीए के जीत की है। अगर पूर्ण बहुमत न भी मिले तो भी वे ही जोड़तोड़ कर सरकार बनाएंगे। मुंबई से मिली सूचना के आधार पर बिहार चुनावों को लेकर बड़े व छोटे सट्टेबाज़ों की एक बैठक भी बीते सप्ताह मुंबई में हुई थी। इसमें सभी सट्टेबाज़ों ने अपनी बातें रखी और कई मुद्दों पर और अन्य बातों पर बिहार चुनाव पर सट्टे के भाव खोलने को लेकर चर्चा हुई थी। कल्यान के एक बड़े सट्टेबाज़ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बिहार में हुए पिछले चुनाव में भाजपा के 91 विधायक बने थे। जेडीयू के 115 उम्मीदवार जीत कर विधानसभा में पहुंचे थे तो वहीं कांग्रेस के सिर्फ 4 ही विधायक जीते थे और आरजेडी के पास 22 विधायक थे। इस परिणाम को काफी ध्यान में रखते हुए इस बार के बिहार चुनाव में सट्टे का भाव तय किया गया है।

सट्टेबाज़ों के अनुसार, बिहार चुनाव में इस बार जेडीयू ने 110 उम्मीदवार उतार रहे हैं तो वहीं उसके सामने भाजपा ने 160 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है। इसीलिए तो भाजपा को टक्कर देने के लिए दोनों पार्टियों ने, आरजेडी ने 100 और इंका ने 40 सीटों पर, ससामंजस्य बिठा कर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है। इसीलिए सट्टेबाजों का मानना है कि इस बार के चुनाव में सट्टा बाज़ार ऐसा गुलज़ार होगा जिसकी किसी को उम्मीद तक नहीं होगी। उनके मुताबिक इस बार के बिहार चुनाव में बहुत ही जबरदस्त कांटे की टक्कर होगी और संभवतः आखिर में स्थिति यह बनती दिखाई दे रही है कि एनडीए को अन्य पार्टियों से कहीं अधिक का फायदा मिल जाए। घाटकोपर निवासी इस बड़े सटोरिये के मुताबिक, देश में जिस प्रकार भाजपा की हवा चली थी उसी से बिहार में भाजपा से डरे हुए तमाम दलों ने मिल कर एक महागठबंधन बनाने का प्रयास किया है, दूसरे हिसाब से देखा जाए तो यह करना एक प्रकार से सभी की बड़ी मजबूरी ही थी। वरना ऐसा महागठबंधन शायद ही होता जिसमें नीतिश और लालू ने हाथ मिलाया। वाकई क्या यह कुछ ज्यादा ही अजीबोगरीब नहीं है।
मलाड के एक सटोरिये के मुताबिक, बिहार में जो भी लोग उनके लिए काम करते हैं उन्होंने बताया है कि इस बार बिहार में सरकार बनने की संभावना सबसे अधिक एनडीए की ही है क्योंकि केंद्र में सरकार होने का फायदा भाजपा को ही मिलेगा। 

लेकिन वहीं कुछ रूझानों के नतीजे भी बड़े ही अजीब निकले हैं जो कि एनडीए के लिए खतरे की घंटी भी हो सकती है। इनके अनुसार, देश का प्रधानमंत्री बनने के पहले जिस तरह के वादे भाजपा के एकलौते चेहरा बने नरेंद्र मोदी ने किए थे, और डेढ़ साल बीतने पर भी कुछ खास होता हुआ जनता को नहीं दिखाई दिया है और तो और सोशल मीडिया व अन्य पर भी प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में अच्छी खासी गिरावट आई है बीते 3-4 माह में। यह एक ऐसा तथ्य है जो चुनाव की तस्वीर भी बदल सकता है। प्रधानमंत्री की गिरती लोकप्रियता  जिसका नुकसान एनडीए को हो सकता है। जबकि वहीं दूसरी ओर नितीश कुमार के कामकाज का आंकलन जब बिहार के गरीब व आम लोग करते हैं तो उन्हें बेहतर राज्य देने वाले मुख्यमंत्री के रूप में सामने रखते हैं और तीसरी तरफ चुनावों में भाई-भतीजावाद न कर तगड़े उम्मीदवारों को ही टिकट देने के कारण भी नीतीश कुमार को काफी फायदा होने की संभावना जताई जा रही है। बिहार में अभी भी अन्य सभी से कहीं अधिक नितीश कुमार की इज्जत व प्रदेश समाज में बनी हुई है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी अड़चन यही बनी हुई है।

सट्टाबाजार का मानना है कि बहुमत हासिल करने के लिए कुल 122 विधायकों का एक ही दल के लिए विधानसभा में पहुंचना जरूरी होता है। इस हिसाब से तो यदि 90 से 95 सीट तक भाजपा को मिल जाती है तो सहयोगी दलों के साथ मिल कर वह सरकार बना सकती है और अगर भाजपा 85 सीटों के नीचे खिसकी कि हाथों से कुर्सी भी निकल जाएगी। दूसरी तरफ बुकियों के मुताबिक महागठबंधन की जीत का आंकड़ा 110 से 115 तक सिमट कर रह सकता है। 26 सितंबर की सुबह खुले बिहार चुनाव के लिए सट्टे के भावों और बाजार के रुझान से साफ लग रहा है कि कुल 25 हजार करोड़ रुपए तक का कारोबार सट्टेबाज इस बार पार कर लेंगे। सटोरियों का अपना निगरानी और शोध का पूरा तंत्र विकसित है, वे न केवल सभी राजनीतिक दलों की सभाओं पर निगरानी रख रहे हैं बल्कि लगातार राजनीतिक पंडितों और खुद राजनेताओं से भी अंदरूनी जानकारियां हासिल करते रहते हैं ता कि जनता की नब्ज़ को टटोल सके और उनके मूड को भी अच्छी तरह से समझ सकें। अगर नब्ज़ टटोलने में फेल हो गए तो सटोरियों को बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है इसीलिए सटोरियों का शोध तंत्र किसी मल्टीनेशनल कंपनियों के शोध तंत्र से कम नहीं होता है। इसके लिए सटोरिये अच्छी खासी रकम खर्च करते हैं।

मुंबई व कल्यान से सूचना प्राप्त हुई है कि सटोरियों व बुकियों की एक अहम बैठक में यह तय हुआ है कि चुनावों पर सट्टा लगाने के लिए कोई भी सटोरिया व बुकी बिहार राज्य में रहकर धंधा नहीं करेगा। वहां पर सिर्फ निगरानी के लिए ही कुछ खास मुखबिरों को रखा गया है जो चेन प्रणाली के तहत सूचना का आदान प्रदान करते हैं। सूचनाओं को अलग लिपि व नंबरों में लिख कर दिया जा रहा है। सबसे बड़ी बात है कि इन्होंने सूचनाओं के आदान प्रदान करने में मोबाइलों का उपयोग नहीं करेंगे बल्कि भीड़भाड़ वाले इलाकों से टेलीफोनों द्वारा सूचनाओं को देंगे। खासतौर पर इन्होंने पुलिस थाने के आसपास, अस्पतालों, बस अड्डों, रेल्वे स्टेशन के आसपास व वीआईपी इलाकों में अधिक समय बिताने का प्लान तय किया गया है। दरभंगा व गया के सटोरियों के मुताबिक, इस सट्टे में कई गैर-शासकीय उच्च वर्ग के लोग, शासकीय अधिकारी वर्ग और खुद राजनेता भी अच्छी–खासी रकम लगाते हैं। वे न केवल अपने उम्मीदवार और दलों की जीत पर सट्टा लगाते हैं बल्कि विरोधी दलों के तगड़े उम्मीदवारों की जीत या हार पर भी सट्टा लगाते हैं। अंधेरी व सांताक्रूज के सटोरियों के मुताबिक, मुंबई और आसपास के इलाकों में बिहार चुनाव का सट्टा लगाने के लिए टीम व प्लानिंग पूरी कर ली गई है और बुकियों ने तैयारी कर ली है और सभी अपने अपने क्षेत्रों के तय अड्डे पर नियत समय से बैठ भी रहे हैं। मुलुंड, कल्यान, मुंबई के कुछ बड़े सटोरियों के अनुसार, बहुत ही बड़े पैमाने पर प्रतिदिन सट्टा लगाना चालू हो चुका है। सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि देश के कई अलग अलग क्षेत्रों से सट्टा लगाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वर्ल्ड कप के बाद अब एक बार फिर से सट्टा बाजार में रौनक वापिस आ रही है। प्रतिदिन पूरे देश के कई इलाकों से भारी बड़े मात्रा में सट्टा लगाया भी जा चुका है और लगाया भी जा रहा है।
         
सट्टा बाज़ार का रेट कार्ड 
–  भाजपा –
85 सीट – 38 पैसे
90 सीट – 72 पैसे
95 सीट – 1.15 रुपए
100 सीट – 1.90 रुपए
105 सीट – 3 रुपए
–  जेडीयू   –
60 सीट – 36 पैसे
65 सीट – 75 पैसे
70 सीट – 1.30 रुपए
75 सीट – 2 रुपए
80 सीट – 6 रुपए
–   आरजेडी –
30 सीट – 40 पैसे
35 सीट – 90 पैसे
40 सीट – 1.65 रुपए
45 सीट – 2.50 रुपए
50 सीट – 6 रुपए
–   कांग्रेस   –
05 सीट – 60 पैसे
06 सीट – 1.10 रुपए
07 सीट – 2 रुपए
08 सीट – 4 रुपए
     
अब तक सबसे अधिक सट्टा भाजपा व आरजेडी पर लग चुका है। कांग्रेस पर सबसे कम सट्टा लगाया गया है। जेडीयू पर भी ठीक ठाक सट्टा लग रहा है। आरजेडी व जेडीयू में ज्यादा का अंतर नहीं है तकरीबन आसपास सट्टा लग रहा है। इन्हीं दोनों में ऊपर नीचे हो रहा है यानि कि सट्टा लगाने के मामलों में दोनों में टक्कर चल रही है।

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