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बुधवार, 9 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ - सड़कों के मामले में राज्य सरकार तक पहुंची आंच, सरकार ने की अनदेखी तो सुप्रीम कोर्ट को करानी पड़ी जांच

छत्तीसगढ़ 9 सितम्‍बर 2015 ( जावेद अख्तर). छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से भिलाई तक बनी फोरलेन और रायपुर शहर में बनी सड़कों के खिलाफ डेढ़ सौ से ज्यादा पत्र लिखने और सलाम छत्तीसगढ़ अख़बार व खुलासा टीवी वेब न्यूज़ चैनल पर कई बार समाचारों को प्रकाशित करने के बावजूद राज्य सरकार, लोक निर्माण विभाग के मंत्री, उच्चाधिकारी और अधिकारियों ने इस ओर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण में दखल देते हुये जांच के निर्देश दिये हैं।

यह प्रदेश व राज्य सरकार के लिए अत्यधिक शरम वाली बात है। रायपुर-भिलाई फोरलेन की बदहाल हालत के लिए राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार भी जिम्मेदार है। राज्य सरकार के पीडब्लूडी मंत्री, विभाग के अधिकारियों समेत कई को सड़क सुधारने के लिए ढेरों पत्र लिखे गए। तकरीबन डेढ़ सौ से ज्यादा पत्र सभी जिम्मेदारों को भेजे गए, लेकिन किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। अंततः सुप्रीम कोर्ट को ही सड़क सुधारने के लिए जांच समिति गठित करनी पड़ी, जिसके बाद असलियत उजागर हुई। फोरलेन सड़क पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद पूरे मसले की पड़ताल की गई। राज्य सरकार व पीडब्लूडी मंत्री की ऐसी लापरवाही से सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी दिखाई है। छत्तीसगढ़ में फोरलेन के संबंध में नेशनल हाइवे केयर टेकिंग एजेंसी की ओर से डेढ़ सौ से ज्यादा पत्र सरकारों व मंत्री को भेजे गए। शासन-प्रशासन, कलेक्टर, विधायक, सांसद, मंत्री से लेकर इसमें वो सब शामिल हैं, जो इस सड़क के रखरखाव और इसे सुधारने पर जनहित में ध्यान दे सकते थे। लेकिन किसी ने भी इस गंभीर मसले पर ध्यान नहीं दिया और यही अनदेखी रायपुर-भिलाई के 37 किलोमीटर फोरलेन को और रायपुर शहर में नवनिर्मित सड़कों को जानलेवा बनाती रही। हैरानी की बात यह है कि पत्र लिखने वालों में वो आम आदमी भी थे, जो कहीं न कहीं इस बदहाली से त्रस्त थे। सड़क पर हो रही दुर्घटनाओं में बढ़ोत्तरी पर खुलासा टीवी वेबन्यूज़ चैनल पर पत्रकार जावेद अख्तर द्वारा समाचार प्रकाशित किया गया था। जिसमें प्रदेश में नवनिर्मित घटिया सड़कों और सड़कों पर हो रहे हादसे और उनमें बढ़ोत्तरी का लेखाजोखा सरकारी सर्वेक्षण व शासकीय विभागों द्वारा दी गई रिर्पोट के आधार पर तैयार करके प्रकाशित किया गया है।
सड़कों पर हादसों में बढ़ोत्तरी के लिए सिर्फ यातायात व पुलिस व्यवस्था पर इल्जाम लगाना उचित नहीं होगा क्योंकि प्रदेश में बीते 2 वर्षों में जितनी भी सड़कों का निर्माण लोक निर्माण विभाग द्वारा किया गया है वो सभी सड़कें महज़ दो या चार महीने तक ही टिकती है तत्पश्चात सड़कों पर इतने अधिक गढ्ढे बन जाते हैं जो कि अंधेरे में जानलेवा साबित हो रहें हैं। अगर केन्द्रीय यातायात व पुलिस विभाग के द्वारा जारी रिपोर्ट पर नजर डालें तो भारत के पांच प्रदेशों में सड़क हादसों की मुख्य वजह सड़क पर बने गढ्ढे और विपरीत दिशा में गाड़ी चलाना है। पांच प्रदेशों की सूची में छत्तीसगढ़ का दूसरा स्थान है। जहां पर 53 फीसदी सड़क पर हादसे के लिए मुख्य कारण घटिया स्तर की निर्मित सड़कें हैं और 29 फीसदी विपरीत दिशा में वाहन चलाने के कारण हादसे हुए तो वहीं केन्द्रीय सरकार सर्वेक्षण की सालाना रिपोर्ट पर नजर डालें तो उनके अनुसार, छत्तीसगढ़ देश में चौथा प्रदेश हैं जहां कि सड़कों में 70 फीसदी भ्रष्टाचार किया गया है बीते चार वर्षों में। बीते दो वर्षों में भ्रष्टाचार बढ़कर 73 फीसदी पहुंच गया है। रिर्पोट में संभावना जताई गई है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दो वर्षों में सड़कों में 78 प्रतिशत भ्रष्टाचार होने लगेगा यानि कि ठेकेदार द्वारा 10 फीसदी राशि जमानत के तौर पर जमा रहती है तो कुल 100 रूपये में से महज़ 17 रूपए निर्माण में खर्च होगा, 10 रूपए बतौर जमानत बाकी बची राशि में से 50 फीसदी कमीशन व 50 फीसदी ठेकेदार के हिस्से में जाएगा। तो सोचिए सड़क कैसी बनेगी? कितने प्रतिशत गुणवत्ता रहेगी? और निर्माण में किस स्तर का काम करवाया जाएगा? कैग द्वारा जारी रिपोर्ट को देखें तो यह पता लगता है कि तेलांगना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और फिर छत्तीसगढ़ आता है जहाँ की नवनिर्मित सड़कों पर सबसे अधिक भ्रष्टाचार किया गया है।

कैग के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बीते पांच वर्षों में लोक निर्माण विभाग में 72.29 फीसदी भ्रष्टाचार हरेक नवनिर्मित सड़कों व मरम्मत कार्यों में किया गया है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में पीडब्लूडी को भ्रष्टाचार के मामलों में तीसरा स्थान दिया गया है। आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि भ्रष्टाचार में प्रथम स्थान पर जनसम्पर्क विभाग (75.66 फीसदी) को और दूसरे स्थान पर जल संसाधन विभाग (73.90 फीसदी) को रखा गया है, तीसरे पर पीडब्लूडी (72.29 फीसदी), चौथे स्थान पर कृषि विभाग (71.01 फीसदी)  पांचवे स्थान पर पुलिस विभाग (69.92 फीसदी), छठे स्थान पर वन विभाग (69.00 फीसदी) , सातवें स्थान पर चिकित्सा विभाग (66.53 फीसदी), आठवें स्थान पर शिक्षा विभाग (65.20 फीसदी), नौवें स्थान पर परिवहन विभाग (64.47 फीसदी) व दसवें स्थान पर राजस्व विभाग (64.01 फीसदी) को रखा गया है। बड़े आश्चर्य की बात है कि 27 शासकीय विभाग में भ्रष्टाचार 50 फीसदी से अधिक है। देश के बजट में से सीधा सीधा 50 फीसदी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है बाकी में जो शुल्क वगैरह होता है वो खर्च काटकर मात्र 37-42 फीसदी तक की वास्तविक राशि ही पहुंचती है और वो भी शासकीय 27 विभागों को छोड़कर। इन 27 विभागों में से पहले स्थान से दसवें स्थान तक के विभागों को छोड़ कर वास्तविक राशि लगभग 28-36 फीसदी ही पहुंचती है। छठवें से दसवें स्थान तक वास्तविक राशि 22-27 फीसदी हो जाती है और पांचवें से पहले स्थान तक में वास्तविक राशि मात्र 15-21 फीसदी हो जाती है। टाप फाइव में ही पीडब्लूडी आता है यानी कि जो भी सड़कें बनी वह सभी अपनी प्रस्तावित राशि में से सिर्फ 15-21 फीसदी वास्तविक राशि के खर्च से बनाई गई, तो इनमें कितनी गुणवत्ता होगी और कितने समय तक टिकेगी, यह तो समझा जा ही सकता है।
     सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का मुख्य कारण
राज्य सरकार व मंत्री के ऐसे गैरजिम्मेदाराना, लापरवाही व मनमानी वाले रव्वैय्ये के चलते ही सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ गया है। राज्य शासन व पीडब्लूडी मंत्री व पीडब्लूडी अधिकारियों को झाड़ लगाते हुए आदेश दिया है कि इन घटिया स्तरीय सड़कों पर अनदेखी क्यों की गई? 150 शिकायतों व कई समाचारों के बावजूद भी जांच क्यों नहीं की गई? क्या इन भ्रष्टाचार में राज्य सरकार व मंत्री की भी भूमिका है या अघोषित सहमति है जो इन घटिया स्तरीय सड़कों के मामलों को संज्ञान में नहीं लिया गया? मंत्री व उच्चाधिकारी द्वारा इन घटिया निर्मित सड़कों के ठेकेदारों पर रहमदिली व कृपा दृष्टि का कोई विशेष कारण? इंजीनियरों और सर्वेक्षण अधिकारियों ने इन घटिया स्तरीय सड़कों पर एनओसी कैसे जारी कर दी? ठेकेदारों के साथ विभागीय उच्चाधिकारियों व अधिकारियों व इंजिनियरों की मिलीभगत होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है, इस आशंका के चलते यह जांच का विषय था? राज्य सरकार व पीडब्लूडी मंत्री द्वारा गैरजिम्मेदाराना, हठधर्मिता, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना, पद व अधिकारों का दुरुपयोग करना दर्शाता है?

   पीडब्लूडी मंत्री ने घटिया सड़कों के मामलों को सुनने से किया था इंकार
राज्य सरकार, लोक निर्माण विभाग के मंत्री, सचिव और उच्चाधिकारियों ने तो मानों कसम ही खा ली है भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करने की और तो और यहां तक कि शिकायत को सुनने से मना कर दिया। आम जनता की समस्याओं को अनदेखा करने में राज्य सरकार व पीडब्लूडी मंत्री राजेश मूणत काफी कुशल हो चुकें है। राजधानी रायपुर में बनी सबसे घटिया स्तर की नवनिर्मित सड़कों के मामले में लोक निर्माण विभाग के मंत्री राजेश मूणत को जानकारी देने के लिए भेंट की गई थी मगर मंत्री राजेश मूणत ने रायपुर में बनी घटिया सड़कों से संबंधित मामले को सुनने से इंकार कर दिया था। जबकि प्रमाणों की उपलब्धता की जानकारी भी दी गई मगर उन्होंने इस मामले पर किसी भी प्रकार की वार्तालाप व प्रमाणों को देखने से इंकार करते हुए बोले कि मेरे पास इन फालतू बातों के लिए समय नहीं है। पीडब्लूडी मंत्री राजेश मूणत ने मामले को संज्ञान में लेना तक जरूरी नहीं समझा, कार्रवाई की बात तो मजाक व बेमानी है। क्योंकि मंत्री के अनुसार, सारी सड़कें उच्च कोटि की बनाई गई है, उच्च स्तर की निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया है, सभी सड़कें गुणवत्तायुक्त व टिकाऊ है। सरकार के मंत्रियों को प्रमाणों से अधिक अपने चमचों पर अधिक विश्वास है संभवतः इसीलिए मंत्री को आज तक रायपुर शहर की सड़कों व फोरलेन में कोई कमी नजर नहीं आती है। विभाग के मंत्री उदासीनता बरत रहें हों तो विभाग के अधिकारी कैसे सुनेंगे।

   हर साल 900 से ज्यादा छोटे-बड़े हादसे हुए
पुलिस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार रायपुर-भिलाई फोरलेन पर औसतन हर साल 35-40 लोगों की जानें जाती रहीं। अलग-अलग हादसों में हर साल 200 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए। सिर्फ हादसों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 38 किलोमीटर की इस सड़क में हर साल 900-1000 छोटे-बड़े हादसे हुए। हर दिन यहां 8-10 छोटे-बड़े हादसे होते हैं, जिनमें 10-15 लोगों को चोटें आती हैं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने वाले एलएम पांडे की मानें तो फोरलेन सड़क के सुधार के लिए लिखी चिट्ठियों को गंभीरता से लिया जाता तो कई जानें भी बचतीं और हादसे भी रोके जा सकते थे। जबकि फोरलेन को छोड़कर रायपुर सिटी के अंदर हादसों के आंकड़ों को देखें तो होश उड़ जाएगें। रायपुर सिटी के भीतर औसतन प्रतिदिन 8 हादसे ऐसे होतें हैं जिनमें गंभीर रूप से घायल होतें हैं और लगभग 22 हादसे ऐसे होतें हैं जिनमें हल्की फुल्की चोटें आतीं हैं। सबसे बड़ी बात है कि कुल हादसों में से 35 फीसदी हादसे सिर्फ खराब सड़कों की वजह से होतें हैं और 19 फीसदी हादसे विपरीत दिशा में वाहन चलाने से व 37 फीसदी तेज गति से वाहन चलाने के कारण हादसे हुए हैं, बाकी 9 फीसदी हादसे अन्य कारणों से होतें हैं। मरने वालों के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रत्येक दस में से 3 मौत का कारण खराब सड़कें होतीं हैं 2 मौत विपरीत दिशा में वाहन चलाने के कारण व 4 मौत तेज गति के कारण होतीं हैं। तेज गति से वाहन चलाने वालों में से हादसे के दौरान अधिकांश मौतें उनकी हुई जो शराब के नशे में वाहन चला रहे थे (4 में से 3)।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चार बड़े सवाल
1. पत्रों और तथ्यों की मानें तो जब फोरलेन कंपनी नियमों का पालन नहीं कर रही थी, तो उसके टोल वसूली के अधिकार पर क्यों लगाम नहीं लगाई गई?
2. बार-बार मेंटिनन्स की मांग होती रही, हादसे होते रहे, लेकिन राज्य सरकार के मंत्री, पीडब्लूडी विभाग के अफसर और नेशनल हाइवे के जिम्मेदारों ने आखिर क्यों ध्यान नहीं दिया?
3. फोरलेन बनाने वाली डीएस कंस्ट्रक्शन कंपनी की टोल वसूली की अवधि समाप्त होने के बाद उसे दो साल का एक्सटेंशन किस आधार पर दिया गया?
4. दो साल का एक्सटेंशन राज्य सरकार व पीडब्लूडी मंत्री को सवालों के कटघरे में खड़ा करता है, तो क्या अघोषित रूप से सहमति थी या मिलीभगत थी?

    कंपनी ने हर दिन वसूले 12 लाख, लेकिन एनएचए को दिए 5 लाख
डीएस कंस्ट्रक्शन अधिकृत रूप से टोल वसूली के दौरान नेहरू नगर और कुम्हारी टोल प्लाजा से हर दिन औसतन 12 लाख रुपए तक की वसूली की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नेशनल हाइवे की एजेंसी ने केवल 5-साढ़े पांच लाख रुपए तक की ही औसतन वसूली की जानकारी दी। तकरीबन 40 फीसदी के इस अंतर से कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। इस अंतर से पीडब्लूडी मंत्री सवालों के घेरे में हैं? यह मिलीभगत या सहमति या भागीदारी दर्शाता है।

ये तो होना ही था। क्योंकि इतने पत्रों के बाद भी जब सरकार ध्यान नहीं देगी, तो सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रवैया लाजमी है। फोरलेन की मरम्मत भी बेहद ही घटिया तरीके से की गई। यह बात तो खुद एजेंसियों की जांच में साबित हुई है। - एलएम पांडे, याचिकाकर्ता

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