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रविवार, 9 अगस्त 2015

रायपुर - कमल विहार मामले में नया खुलासा, बिना जमीनी सर्वे के अधिगृहीत की गई भूमि

रायपुर 9 अगस्‍त 2015 (जावेद अख्तर). छत्तीसगढ़ सरकार की सबसे बड़ी कॉलोनी के प्रोजेक्ट कमल विहार पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के बाद कई बड़े खुलासे सामने आए हैं। आरडीए चार लोगों के अधिग्रहण के बाद एक नए मामले में फंस सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरडीए द्वारा किए गए जमीन के अधिग्रहण को गैरकानूनी और असंवैधानिक इसलिए करार दिया, क्योंकि इस अधिग्रहण में कानून के प्रमुख बिंदुओं का ही पालन नहीं हुआ है। इसी आधार को मानें तो कमल विहार में अधिग्रहण से पहले न तो जमीनी सर्वे करवाया गया और न ही भौगोलिक परिक्षेत्र के हिसाब से लोगों की लिस्ट बनाई गई।

अब लोकेशन और दी हुई जमीन के आधार पर जब आवंटन की बारी आई तो उन्हें आरडीए जमीन देने से इंकार कर रहा है। ऐसे करीब 384 लोग हैं, जिनके साथ आरडीए का एग्रीमेंट भी हुआ था, लेकिन अब इस पूरे अधिग्रहण पर ही सवाल खड़ा हो गया है। ऐसे लोग भी अब कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं। कमल विहार में तकरीबन 1600 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर इसकी योजना बनाई गई। ये जमीन तकरीबन पांच हजार लोगों की है। इन सभी की जमीन आरडीए ने अधिगृहीत कर सीधे अपने नाम पर करा ली। इसके लिए उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया, जबकि सभी के साथ 35 फीसदी जमीन का प्लॉट देने का एग्रीमेंट किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस एग्रीमेंट पर ही आपत्ति जताई है और ऐसा करने वाली समिति को ही अवैध करार दिया। अब सवाल यह है कि 35 फीसदी जमीन लेने के लिए सहमत लोगों में तकरीबन 384 लोगों को आरडीए जमीन देने से इंकार कर रहा है। आरडीए का तर्क है कि ये ऐसे लोग हैं, जिनकी जमीन रोड-रास्ते और नाली निर्माण में खप गई। ऐसे 384 लोग अब दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक गए हैं। इनका एक बड़ा पैनल भी अधिग्रहण पर फैसले को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने की तैयारी कर रहा है। 

भौगोलिक सर्वे नहीं होने से हो रही ये गड़बड़ी
कमल विहार की जिस समिति ने बिना भौगोलिक सर्वे के लोगों की जमीन अधिगृहीत की, उनमें 50 फीसदी से ज्यादा वे लोग प्रभावित हो रहे हैं, जिनके प्लॉट को रोड-रास्ते में तब्दील कर दिया गया। क्योंकि अब उन्हें दूसरे की जमीन दी जा रही है और जिसकी जमीन उन्हें मिल रही है, उसे किसी दूसरे की। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह है कि पहले जिस व्यक्ति की क्रीम लोकेशन में जमीन थी, उसे अब आरडीए घटिया लोकेशन में प्लॉट का ऑफर कर रहा है। ऐसे में उसे हर तरफ से नुकसान है। क्योंकि उसने जमीन मुफ्त में दी। बदले में जो 35 फीसदी प्लॉट मिल भी रहा है, वह भी ऐसी जगह, जहां की कीमत खासी कम हो गई। ऐसी स्थिति में ही समिति के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़ा किया है। साथ ही जिन जमीन दलाल और माफियाओं ने पहले अवैध रूप से प्लॉटिंग कर लोगों को जमीन बेची थी, उन्हें अब रोड रास्ते की भी जमीन दी जा रही है। यह मामला सेटिंग से हो रहा है। 

पहले उन्हीं बिल्डरों और दलालों ने रोड-रास्ते के आधार पर उस जमीन को बेचा था, लेकिन अब वे नए सिरे से जमीन हासिल कर अवैध रूप से पैसा कमाएंगे। ये वे लोग हैं, जिन्होंने अपनी जमीन तो गंवाई, लेकिन उन्हें न तो प्लॉट और न ही मुआवजा दिया जा रहा है। 

प्रोजेक्ट से पहले जिन लोगों ने अपनी जमीन के कई हिस्से किए थे, उसे आरडीए ने प्लाटिंग का हवाला देकर रोड-रास्ते में भी बांट दिया। अब वे रोड-रास्ते के हिस्से का हवाला देकर उन्हें प्लॉट आवंटित करने से इंकार कर रहे। 

योजना से पहले जिनके पास रोड-रास्ता के नाम पर भी जमीन थी, उसे भी आरडीए ने अलग कर दिया। हैरानी की बात यह है कि ऐसे लोगों की जमीन लेने से पहले आरडीए ने बाकायदा प्लॉट देने का एग्रीमेंट किया था, लेकिन अब इस पत्र को ही नहीं मान रहा है। 

ऐसे कई परिवार, जिनके भाइयों के बीच जमीन बांटी गई। उनकी जमीन का एक टुकड़ा जिस भाई के पास गया, उसे आरडीए रोड-रास्ते की जमीन बताकर उसे प्लॉट देने से इंकार कर रहा है। 

ज्यादातर ऐसे लोग हैं, जिनकी जमीन आरडीए के नए नक्शे में भी रोड-रास्ते में खप गई, उन्हें भी एलॉटमेंट लेटर के आधार पर दूसरे की जमीन का हवाला दिया जा रहा है। साथ ही उन्हें नए आवंटन से भी वंचित रखा जा रहा है।

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