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शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

छत्तीसगढ़ - रतिजा एनीकेट दोषी को दी मनियारी की जिम्मेदारी, उसने नहर लाइनिंग में अरबों की हेराफेरी कर डाली

रायपुर/छत्तीसगढ़ 24 जुलाई 2015 (जावेद अख्तर ). जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार और घोटाले के खुलासों और आयकर विभाग द्वारा छापेमारी की कार्रवाई होने के बावजूद, भ्रष्‍टाचार में कोई कमी नहीं आई है और न ही इस विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों में किसी भी प्रकार का भय है। आयकर विभाग द्वारा की गई कार्रवाई से दो-चार दिनों तक ही असर रहा उसके बाद फिर से सब कुछ वही पुराने ढर्रे पर आ गया है। वर्तमान में फिर से इस विभाग में भ्रष्‍टाचार ने अपनी पैठ जमा ली है और फिर से भ्रष्टाचार का खेल पूरे विभाग में जोरशोर से चल रहा है।
इसी क्रम में ताजातरीन सूचना प्राप्त हुई है कि रतिजा एनीकेट के 90 लाख के घोटाले की रिपोर्ट जिसे तीन महीने में जमा करने का आदेश दिया गया था, उस आदेश को हवा में उड़ाते हुए ढाई साल होने के बावजूद भी जांच रिपोर्ट जमा नहीं की गई है। इसे भ्रष्टाचार की इंतेहा कहें या भ्रष्टाचार में कीर्तिमान, क्योंकि जो भी हो रहा है वह संभवतः राज्य सरकार के मुख पर कालिख पोतने के लिए कम नहीं है। जल संसाधन विभाग पिछले 6 वर्षों से भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका है। उक्त मामला कोरबा जिले में बनने वाले रतिजा एनीकेट से है। रतिजा एनीकेट में मुख्य अभियंता राजाराम सारथी ने 90 लाख से अधिक रूपयों की हेरफेर की थी। उक्त मामले को लेकर राजाराम सारथी समेत अन्य अधिकारियों और ठेकेदारों पर 12 आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। राजाराम सारथी व अन्य के विरूद्ध धारा 161, 164, 384, 385, 386, 420, 467, 468, 469,  471, 434, 34 IPC के तहत मामला दर्ज किया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन ने 12 अप्रैल 2012 को घोटाला खुलने के कारण जल संसाधन विभाग, कोरबा में पदस्थ तीनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया था। जिसमें कार्यपालन अभियंता राजाराम सारथी, कार्यपालन उपअभियंता के.एन. शर्मा तथा सहायक अभियंता एस.के.गुप्ता थे। घोटाले का खुलासा आपस में हिस्सेदारी बांटने को लेकर हुआ था। जिसकी जानकारी अन्य एक ठेकेदार को प्राप्त हुई थी, उस ठेकेदार ने शपथपत्र दायर कर तीनों अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। जिसके आधार पर ही रतिजा एनीकेट की जांच की गई थी जिसमें घोटाले का सच सामने आया था। खुलासे के बाद मामले कि विभागीय जांच की जिम्मेदारी देते हुये हसदेव कछार, बिलासपुर को जांच अधिकारी और अधीक्षण अभियंता जल संसाधन मंडल बिलासपुर को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किया गया था तथा तीन माह में जांच कर रिपोर्ट देने का आदेश दिया गया था। मगर ढाई साल से भी अधिक समय होने बावजूद भी रिपोर्ट विभाग में जमा नहीं की गई है। जानकारी मांगने पर सभी अधिकारियों का एक ही रटा रटाया जुमला है कि इस संबंध में मुझे जानकारी नहीं है, मैं जानकारी में लेकर पूछताछ करता हूँ, अगर ऐसा हुआ है तो निश्चित रूप से दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। मगर न ही इसके आगे पूछताछ हो रही है और न ही कोई जानकारी ही दी जा रही है। जल संसाधन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों ने पूरे विभाग को चौपट करके रख दिया है उस पर विभाग के सबसे आला अधिकारी का क्या कहना। इतने वर्षों के बावजूद भी उन्हें न ही कुछ पता होता है और न ही जानना ही चाहते हैं, उन्हें न तो मनियारी के नहर लाइनिंग में भ्रष्‍टाचार दिखता है। रतिजा एनीकेट के दोषी राजाराम सारथी व अन्य में कोई खोट नज़र ही नहीं आती है, जबकि ये आला अधिकारी यहाँ पर पदस्थ होने से पहले इन सभी क्षेत्रों में पदस्थ रह चुके हैं और कई सारे मामलों में इनकी सहभागिता की बातें भी सामने आ रही हैं पर बावजूद इसके वो बहाने बनाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। खुद को सफेद पोश साबित करने वाले को यह नहीं समझ आता कि भ्रष्टाचार कितना भी सफाई से क्यों न किया जाए मगर अपना निशान व सबूत छोड़ ही जाता है। फिर चाहे वह बस्तर में किया गया हो या फिर चाहे कोंडागांव में। बहरहाल संभवतः इसीलिए आला अधिकारी को भी भ्रष्टाचार नहीं दिखाई देता है।
गौरतलब रहे कि कोरबा के कटघोरा जल संसाधन उपसंभाग में लाखों की लागत से रतिजा एनीकेट का निर्माण किया गया था, उस समय राजाराम सारथी कार्यपालन अभियंता के पद पर था। सारथी ने उच्च अधिकारियों की अनुमति के बगैर ही अलग अलग तारीखों में, 22 लाख 72 हज़ार 208 रूपए, 58 लाख 82 हज़ार 700 रूपए और 8 लाख 73 हज़ार 220 रूपए यानि कुल 90 लाख 28 हज़ार 128 रूपए निकाल कर फर्जी तरीके से भुगतान कर दिया था। इस फर्जीवाड़े में कार्यपालन उपअभियंता के.एन शर्मा की भी बराबर की भूमिका थी। निलंबित तीनों अधिकारियों को विभाग ने महज़ दो साल के बाद बहाली दे दी जबकि घोटाले का प्रकरण माननीय न्यायालय में लंबित होने के बावजूद भी कोर्ट से बहाली नहीं ली गई और तीनों अधिकारियों को बकायदा पदस्थापना दे दी गई। राजाराम सारथी को कार्यपालन अभियंता मनियारी जल संसाधन संभाग मुंगेली में पदस्थ किया गया के.एन. शर्मा को उपअभियंता जल संसाधन जशपुर में तथा एस.के. गुप्ता को सहायक अभियंता जल संसाधन सूरजपुर में पदस्थ किया गया। पदस्थापना के कुछ महीनों के पश्चात ही राजाराम सारथी ने वहाँ पर भी अपनी काली करतूतों के निशान छाप दिये हैं, क्योंकि मुंगेली, मनियारी में नहर लाइनिंग के निर्माण में भी भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ जिसमें प्रमुख आरोपी राजाराम सारथी को ही बताया जा रहा है, इतना सब होने के बाद भी राजाराम सारथी पर कार्रवाई नहीं की गई है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, दरअसल राजाराम सारथी, जल संसाधन विभाग के सबसे आला अधिकारी का खास चमचा है जिसकी वजह से विभाग कार्रवाई नहीं कर रहा है। मनियारी जल संसाधन, मुंगेली में एआईडीपी के अन्तर्गत अरबों रूपयों की लागत से बनने वाली नहर लाइनिंग में खुलेआम भ्रष्टाचार किया गया और मद से प्राप्त राशि की बंदरबांट की गई। नवनिर्मित जिले मुंगेली में एआईडीपी के अन्तर्गत मुख्य नहर लाइनिंग जो कि खुड़िया से बनना शुरू हुई थी, मुख्‍य नहर को तीन भाग क्रमशः डी 1, डी 2 और डी 3 में बांट कर निर्माण कराया गया है। जिसमें डी 1 के पास चार ग्रुप, डी 2 और डी 3 के पास तीन तीन ग्रुप थे। मगर अभी चंद माह पहले ही इस नहर लाइनिंग के निर्माण को पूरा किया गया है मगर अभी से ही नहर लाइनिंग की हालत जीर्ण-शीर्ण हो गई है, सबसे बड़ी बात यह है कि अभी तक नहर का उपयोग शुरू भी नहीं हुआ है और भ्रष्टाचार ने अपना कारनामा दिखा दिया है। पूरे नहर की लाइनिंग उखड़ गई है, नहर की आकृति बिगड़ गई है, लाइनिंग में कई स्थानों पर छोटे गढ्ढे तथा कुछ स्थानों पर तो बड़े बड़े गढ्ढे हो गए हैं। नहर में उतरने के लिए सीढ़ियों का अभी उपयोग शुरू भी नहीं हुआ है और अभी से ही सीढ़ियाँ टूट फूट गई है, प्लास्टर का तो नामों निशान तक नहीं मिला है, ईंट व पत्थर भी सबसे घटिया स्तर का लगाया गया है, कुछ सीढ़ियाँ तो भसक या दरक कर गायब हो गई है। जबकि बजट सबसे उच्च मानकों के अनुरूप ही दिया गया है मगर उपयोग की गई सभी सामग्रियां सबसे निचले स्तर की हैं।

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