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शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

नक्‍सलियों के निशाने पर इंटेलिजेंस जवान, सूचना के बाद से गृह मंत्रालय परेशान

रायपुर 17 जुलाई 2015 (जावेद अख्तर). लेफ्ट विंग एक्सट्रिमिस्ट यानी वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए केंद्रीय शासन ने इंटेलिजेंस पुलिस को नई तकनीक और हाइटेक सुविधाओं से लैस करने की तैयारी की है। इस बात की भनक नक्सलियों को होने के बाद, नक्सली भी अब इस तैयारी के प्रति उत्तर में अपनी सुविधाओं को चाक चौबंद करने में जुट गये हैं। नक्सलियों ने अपना ध्यान का केन्द्र बदलकर इंटेलिजेंस पुलिस के जवानों को नया निशाना बना लिया है।
इस जानकारी के बाहर आते ही गृह मंत्रालय की तैयारी में धीमापन आ गया है और प्रशासन अब चिंतित भी हो उठा है। चूंकि बीते तीन वर्षों में नक्सलियों ने पुलिस के 163 मुखबिरों को मौत के घाट उतारकर उनके नेटवर्क को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। पुलिस के टारगेट को ही निशाना बनाकर नक्सली अब उनके इंटेलिजेंस जवानों पर हमला करने की तैयारी में लग गये हैं। नक्सलियों को सबसे अधिक नुकसान इंटेलिजेंस जवानों ने पहुंचाया है इसी सब बातों पर ध्यान केंद्रित करते हुए वे अब इंटेलिजेंस जवानों के मनोबल को तोड़ने या अपने नियंत्रण में लेने की मंशा पर काम कर रहे हैं। हालांकि इस योजना पर नक्सली पहले भी काम किया करते थे, लेकिन पुलिस मुखबिर की मौत को सामान्य ग्रामीण की मौत के तहत गिना जाता था। अब इस आंकड़े को अलग कर पुलिस के इंटेलिजेंस पर नए सिरे से मंथन किया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मुद्दे को बेहद ही गंभीरता से लिया है और सभी वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को अलर्ट भेजा है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी बीते दो सालों के नक्सली वारदातों के आंकड़ों पर गौर करें तो नक्सली पुलिस के सशक्त मुखबिरों की कड़ी को तोड़ने में कामयाब रहे हैं। पहली बार मारे गए नागरिकों में पुलिस ने अपने मुखबिरों की भी रिपोर्ट बनाई, मगर आमतौर पर रिपोर्ट का खुलासा नहीं होता था, लेकिन अब गृह मंत्रालय ने इस पर गंभीरता से मंथन शुरू कर दिया है। छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय की ओर से स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) को विशेष रूप से इस बारे में अवगत कराया गया है कि वे अपने मुखबीरों के नाम का खुलासा न होने दें। इतना ही नहीं, उन्हें गुप्त रखने के लिए भी कई तरह के विशेष निर्देश जारी किए गए हैं। जबकि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से नक्सली क्षेत्रों में सिर्फ इंटेलिजेंस का काम करने वालों के लिए अलग से बजट निर्धारित होता है। यह गोपनीय बजट कहलाता है, जिसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है। इस बजट के तहत प्रशासन नक्सलियों की गोपनीय रणनीति और तमाम गुप्त जानकारियों के लिए अपने विशेष मुखबिरों को लाखों रुपए देती है। अगर अब हालात बदलते जा रहें हैं क्योंकि नक्सलियों द्वारा इन गुप्त मुखबिरों की कड़ी तोड़ने से पुलिस प्रशासन के इंटेलिजेंस के लिए अत्यंत गंभीर व बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।

दर्दनाक मौत से मुखबिरों के दिलों में खौफ
 नक्सली अधिकांश पुलिस के जवानों के साथ-साथ मुखबिरों की भी हत्या करने में बेहद दर्दनाक और खौफनाक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। वे गाड़ियों के पीछे बांधकर कच्ची व पथरीली जमीनों पर रगड़ते है और सिर काटने के बाद उनके शरीर को लटका देते हैं, ताकि यह अत्यंत हौलनाक लगे। इतना ही नहीं, कई बार शरीर को कई छोटे छोटे टुकड़ों में काटने, हाथ काटने, उंगलियां काटने और आंखें निकाल लेने की भी घटना सामने आई है। ज्यादातर ऐसी मौतों में गोलियां नहीं खर्च की जातीं। खुखरी या धारदार चाकुओं का इस्तेमाल कर मुखबिर की हत्या की जाती है, ताकि इसे देखने वाले या इसके बारे में सुनने वाले कभी पुलिस का साथ न दें। कई बार जन अदालत लगाकर गांव के बीच में ऐसी हत्याओं को अंजाम देते हैं जिससे ग्रामीण समेत मुखबिरों के दिलों में उनका इतना अधिक डर बैठ जाए और वे पुलिस प्रशासन को किसी भी प्रकार का सहयोग न करें और कोई भी मुखबिर न बने। 

नक्सलियों द्वारा पुलिस मुखबिरों की हत्या 


राज्य
2015
2014
2013
छत्तीसगढ़
12
09
33
आंध्रप्रदेश
01
02
04
झारखंड  
02
01
35
महाराष्ट्र   
05
03
09
ओड़िशा  
06
10
25
तेलंगाना  
00
02
04
बिहार      
01
02
07
कुल   
27
29
117


जनअदालत में हत्याओं के आंकड़े
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस बार नक्सलियों द्वारा जन-अदालतों में की गई हत्याओं का आंकड़ा भी जारी किया गया है। आंकड़े के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 2 सालों के भीतर 8 बड़ी जन-अदालतें लगाई गईं। इन सभी में मुखबिरों को पहचान कर उन्हें सज़ा-ए-मौत का दण्ड दिया गया। वर्ष 2014 में 2 और 2015 में अब तक 6 जन-अदालतें लगाई जा चुकी है। झारखंड में ऐसी जन-अदालतें सबसे ज्यादा होती हैं। वहां पर जन-अदालतों का आंकड़ा 18 है। इसके अलावा बिहार में 2 वर्षों में 6 जन-अदालतें और ओडिशा में 2 जन-अदालतें लगाई गई थीं। 

ग्रामीणों को भी मुखबिर बताकर मार रहे 
आईजी छत्तीसगढ़ एसआईबी के आईजी दीपांशु काबरा ने बताया कि यह बेहद ही गंभीर व दर्दनाक घटना है, क्योंकि जब इसकी गहराई से जांच पड़ताल की तो ऐसे भी कई मामले सामने आए, जिनमें नक्सलियों ने ग्रामीणों को अकारण ही मुखबिर बताकर जान से मार दिया गया था। वे दहशत फैलाने के उद्देश्य से ऐसी हत्याओं को अंजाम देते हैं। बस्तर के भीतरी इलाकों से जब कोई बाहर पढ़ने-लिखने या कॉलेज के लिए आता है तो नक्सली उस पर बराबर नजर रखते हैं। कई बार ऐसे ग्रामीणों को गांव लौटने पर नक्सली उसको पुलिस का मुखबिर करार देते हैं और बतौर सजा हत्या कर दी जाती है। नक्सलियों की यह नीति पूरी तरह दहशत और डर फैलाने का तरीका है और इससे वे पुलिस के इंटेलिजेंस को कमजोर करने का प्रयास करते हैं। 

 मुखबिरों की सूचना नक्सलियों तक
छत्तीसगढ़ प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों में जिस प्रकार पुलिस व इंटेलिजेंस के मुखबिरों की हत्या नक्सलियों ने की है इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब इंटेलिजेंस के मुखबिरों को अत्यंत गोपनीय रखा जाता है और उनकी जानकारी प्रशासन व गृह मंत्रालय के गिने चुने सदस्यों को ही होती है, तो गुप्त मुखबिरों की जानकारियां नक्सलियों तक कैसे पहुंच गई? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब प्रशासन व गृह मंत्रालय को अवश्य तलाशना चाहिए। क्योंकि कहीं, कुछ तो ऐसा है जो प्रशासन व इंटेलिजेंस की नज़रों से अब तक बचा हुआ है। बार बार इंटेलिजेंस के गुप्त मुखबिरों की हत्या होना किसी न किसी रूप में इंटेलिजेंस की कार्यप्रणाली व गुप्त तरीकों में छेद होने की बात को पुख्ता करती है। अब अगर इंटेलिजेंस के गुप्त मुखबिरों को भी गुप्त रखने में प्रशासन व विभाग नाकामयाब हो रहा है तो फिर कैसे नक्सलियों पर लगाम लगाने में सफल हो सकते हैं? इस बात पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भी गहन विचार करने की आवश्यकता दिखाई दे रही है? अगर इस छेद को ढूंढ कर जल्द से जल्द बंद नहीं किया गया तो आने वाले समय में कई गुप्त मुखबिरों की हत्या होना निश्चित है। एक बार गुप्त मुखबिरों की कड़ी पूरी तरह ध्वस्त हुई कि इसका परिणाम नक्सलियों की रणनीति, अन्य गुप्त व महत्वपूर्ण सूचना और उनके द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारियां, केंद्र व राज्य शासन को नक्सलियों द्वारा अंजाम दी गई घटनाओं के पश्चात ही मिलेगी।

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