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बुधवार, 17 जून 2015

कानपुर - नेता करा रहे हैं बाल श्रम, श्रम विभाग की आंखे बन्‍द

कानपुर 17 जून 2015. नगर में न जाने ऐसे कितने बच्चे हैं जिनकी उम्र लगभग 5 वर्ष से लेकर 13 वर्ष तक है और जो अपने तथा अपने माँ - बाप की पेट की आग को बुझाने के लिए होटलों में काम करते हैं या कूड़ा तथा कबाड़ बीनते हैं । जिन बच्चों के हाथ में पेन, पेंसिल तथा खिलौने होने चाहिए । आज उनके हाथों में जूठे बर्तन और कबाड़ से भरी बोरी लटकती है। ऐसा ही नजारा आपको कानपुर सेन्‍ट्रल रेलवे स्‍टेशन के पास देखने को मिल जायेगा जहां दो सबसे बडे राजनैतिक दलों के नेताओं के होटल अगल-बगल है और दोनों में ही मासूम बच्‍चे काम करते हैं।
कानपुर सेंट्रल स्टेशन कैंट साइड में दो माननीय नेताओं के होटल में आधी रात तक काम करते ये मासूम बच्चे ना तो पुलिस वालों को दिखते हैं ना ही किसी समाजसेवी संस्था या चाइल्ड हेल्प लाइन को और ना ही हमारे समाज के तथाकथित ठेकेदारों को । ये बच्चे जो आने वाले कल का भविष्य हैं आज बुरे हाल में हैं, श्रम विभाग की नज़र यहां कब पडेगी ये तो भगवान ही बता सकते हैं। पर सवाल ये है कि जिनके माँ - बाप इतने गरीब हैं की उनके पास रहने को घर, पहनने को कपड़ा तथा खाने को दो वक्त की रोटी भी नहीं है वे बेचारे अपने बच्चों को कैसे पढायें । उन्‍हें मजबूरन अपने बच्चों से ये काम कराना पड़ता है । किसी तरह ये बच्चे कूड़ा बीनकर तथा होटलों में थाली की जूठन धोकर अपना तथा अपने गरीब माँ - बाप का पेट पालते हैं । ये बच्चे भी चाहते हैं कि मेरे इन हाथों में कूड़े से भरी बोरी की जगह पेन, पेंसिल तथा खिलौने हो लेकिन ये क्या करें, पापी पेट का सवाल जो है । इन बच्चों को खुद नही पता कि‍ आने वाला कल क्या होगा। सरकार इन बच्चों की पढ़ाई - लिखाई के लिए न जाने कितने पैसे खर्च करती है । लेकिन इन बच्चों के पास वह फ्री शिक्षा की सुविधा नहीं पहुंच पाती है । यदि इसी तरह से देश का भविष्य अँधेरे में जाता रहा तो देश में अच्छे दिन कभी नहीं आ पाएंगे। 

(कानपुर से शीलू शुक्‍ला एवं शाहनवाज़ ख़ान की रिपोर्ट)

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