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सोमवार, 23 मार्च 2015

सुल्तानपुर का संत तुलसीदास पी जी कॉलेज बना भ्रष्‍टाचार का अड्डा

सुल्तानपुर। कादीपुर तहसील में स्थित संत तुलसीदास पी जी कॉलेज के प्राचार्य अरविन्द पाण्डेय के द्वारा व्याप्त भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में एक खुलासा वर्ष 2012 के मार्च में हुआ था। इस खुलासे का सीधा असर पड़ना चाहिए था असर मगर हुआ उल्टा। महाविद्यालय प्रबन्धतंत्र ने अपनी सभा में एक कथित जाँच कमेटी का गठन तो किया पर कार्यवाही अभी तक कोई नहीं हुयी।
इस जांच कमेटी का गठन अगस्त 2012 में प्रबंधक और अध्यक्ष ने किया था । इस जाँच कमेटी ने रिपोर्ट देना तो छोड़िये आज तक अपना काम भी शुरू नहीं किया है। आइये आपको यहाँ के तंत्र और भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में बताते है- 
महाविद्यालय :- वर्तमान में महाभ्रष्टालय बने इस महाविद्यालय को स्वर्गीय पंडित राम किशोर त्रिपाठी ने स्थापित किया था । कर्मयोगी पंडित जी ने बहुत मेहनत मशक्कत के बाद इस महाविद्यालय की स्थापना की थी। पंडित जी की एक मात्र वारिस उनकी सुपुत्री हीरा देवी थीं। हीरा देवी के परिवार के लिए दिए बलिदान का यह सिला दिया गया की पंडित जी की जन्मशती समारोह में मंच पर पंडित जी की सुपुत्री को ही स्थान नहीं दिया गया| आज यदि पंडित जी होते तो ऐसी महाविद्यालय की दुर्दशा नहीं होती। 
प्रबंधक :- इस महाभ्रष्ट महाविद्यालय के प्रबंधक है श्रीमान सौरभ त्रिपाठी उर्फ़ हनुमान जी,ये मान्यवर केवल विरासत के कारण प्रबंधक वर्ना ये एक सिम्पल ग्रेजुएट है। ये स्वर्गवासी पंडित जी के भाई रामराज त्रिपाठी के नाती है यदि परिवार के निकटसत सूत्रों की माने तो पंडित जी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में केवल इनको इस कारण प्रबन्धक बनाने को परिवार से कहा की परिवार का विघटन ना हो जाये अन्यथा प्रबन्धक लायक परिवार के नज़र में इनकी योग्यता नहीं थी। 
अध्यक्ष :- ओम प्रकाश पाण्डेय उर्फ़ बजरंगी यहाँ के अध्यक्ष पद पर आसीन है पारिवारिक सूत्रों के अनुसार ये पंडित जी के सुपुत्री के दामाद है देखने में सभ्य सुशील शालीन व्यक्तित्व के धनी पाण्डेय जी भाजपा के सांसद वरुण गांधी के प्रतिनिधि भी है। भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर बदलाओ के लिए चुनाव लड़े गांधी-नेहरू परिवार के चश्म-ओ-चिराग के प्रतिनिधि ही भ्रष्ट कॉलेज के अध्यक्ष है और उस भ्रष्टाचार को मौन सहमति दे रहे हैं तो आम जनता के सामने क्या उदाहरण रखेगे सांसद महोदय समझ के परे है। 
प्राचार्य :- यहाँ के प्राचार्य पद की गरिमा को नष्ट कर रहे है वर्तमान में डॉक्टर अरविन्द पाण्डेय मान्यवर ने स्नातक मेरठ विश्वविद्यालय से किया तदुपरांत इनके घोषणा पत्र के अनुसार इन्होंने 1982-83 इन्होंने परास्नातक प्रथम वर्ष मेरठ विश्वविद्यालय से किया और अंतिम वर्ष का पाठ्यक्रम छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से किया। श्री स्वर्गीय कृष्ण कुमार पाण्डेय और श्रीमती सत्यभामा पाण्डेय के पुत्र ने अपना स्थाई पता अपने ससुराल का लिखा है, ये यह अवश्य बताते हैं की कानपुर के एक कॉलेज के इनके ससुर प्रबंधक है इनके साढू प्रवक्ता हैं। सास ये हैं परन्तु अपने परिवार जिसने इनको जन्म दिया पाल पोस के इतना बड़ा किया उसके सम्बन्ध में कोई बात नहीं करते हैं। इनके द्वारा आयोग को घोषित इनका मूलनिवास और पत्राचार का निवास एक ही है जो इनका ससुराल है। आइये इनके सम्बन्ध में कुछ और भी बताते है | मान्यवर ने बतौर तदर्थ प्रवक्ता 4 फरवरी 1991 को अपने ससुर के महाविद्यालय में नौकरी पाई जहां इनका मूल वेतन 2200 था केवल केवल 5 माह नौकरी करने के उपरान्त 1 जुलाई को स्थाई प्रवक्ता हो गए है आप अचंभित न हो ये कोई भी कारनामा कर सकने में सक्षम हैं जबकि शायद मेरी जानकारी के अनुसार ऐसा सम्भव बिना जुगाड़ के नहीं है| मान्यवर के परिचय दाता भी समस्त ससुराली रिश्तेदार है। अब मान्यवर के कुछ अतिरिक्त क्रियाकलापों को गौर करते है :- 
वेतन वापसी नगद :- अपने अधिनस्‍थ अनुमोदित शिक्षकों के वेतन का मान्यवर 50% हिस्सा वापस नगद ले लेते हैं इस सम्बन्ध में एक प्रवक्ता डॉक्टर ममता सिंह इनके उत्पीड़न से त्रस्त होकर न्यायलय के शरण में चली गयीं जहां उनका मुक़दमा विचाराधीन है, वही एक अन्य प्रवक्ता डॉक्टर धनंजय सिंह में पैसा देने से मना किया तो उनको नौकरी ही ज्वाइन नहीं करने दिया। जो इनके खिलाफ बोला उसकी ये बैंड बजा देते हैं इसी कारण इनका विरोध कोई नहीं करता है। 
छात्रवृत्ति के नाम पर वसूली:- हमको प्रदान किये गए पत्र के अनुसार यहाँ के छात्र छात्राओ ने कहा है की ये महोदय छात्रवृत्ति का फार्म जमा करने के नाम पर ही 100 रुपया से लेकर 200 रुपया प्रति छात्र छात्रा वसूलते हैं वर्ना फार्म जमा ही नहीं करते हैं। इनका जुगाड़ इतना है की छात्र छात्राओं का एक प्रतिनिधिमंडल उपजिलाधिकारी कादीपुर से इनकी शिकायत लिखित करता है परन्तु अधिकारी महोदय भी उन गरीब बच्चों की बातें नहीं सुनते हैं। 
शिक्षकों की लिस्ट में हेरा फेरी :- मान्यवर ने वर्ष 2013-2014 हेतु शिक्षकों की लिस्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को भेजी जिसमें उनके यहाँ शिक्षकों की संख्या 57 दिखाई गयी निदेशालय को भेजी लिस्ट में शिक्षकों की संख्या 23 है जबकि क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी को भेजी गई लिस्ट में संख्या 47 है । ये है साहेब का जुगाड़। 
टैक्स काटते हैं जमा नहीं करते :- मान्यवर कई स्थाई शिक्षकों का टैक्स तो काटते हैं परन्तु उसको जमा नहीं करते है इस सम्बन्ध में आयकर विभाग स्थाई शिक्षकों डॉ आदित्य नारायण, डॉ शैलेन्द्र पाण्डेय, डॉ अम्बिका मिश्रा, डॉ सुशील पाण्डेय, डॉ इंदुशेखर उपाध्याय, डॉ एस वी सिंह आदि को नोटिस भी दे चुका है। 

प्राचार्य के साथी 
डॉ रविन्द्र मिश्रा :- मान्यवर प्राचार्य के समस्त कारनामों में उनके मुख्य साथी हैं श्रीमान इतने बड़े वाले महान है की इन्होंने एक उच्च मंत्री अधिकारी व विश्वविद्यालय में घूस देकर स्थाई नौकरी करवाने के नाम पर कई शिक्षकों से पैसे उठाये और खा गए एक शिक्षक से 2 लाख रुपया लिया और पूरे ज़िले में इनका साथ दिया डॉ धर्मेन्द्र पाण्डेय ने और 50-60 लाख रुपया गड़प कर गए जिसके बल पर मात्र 18000 वेतन पाने वाले इन महानुभाव का एक आलीशान मकान सुल्तानपुर शहर में,एक डिग्री कॉलेज और एक कार की एजेंसी भी ले ली है ये है तो एक शिक्षक परन्तु अपने कभी कक्षा में नहीं जाते है सिर्फ प्राचार्य की चाटुकारिता में लगे रहते है। कभी ड्राइवर तो कभी पी ए तो कभी चाय पिलाने वाले नौकर की भूमिका में रहते है कॉलेज का कोई भी शिक्षक इनको पसंद नहीं करता है फिर भी ये सबको अपनी उंगली पर नचाते है।  
दुर्गेश :- एक ढेढ़ी आँख के साथ ये महाशय है तो अस्थाई क्लर्क परन्तु इनके कार्य बहुत हैं छात्रवृत्ति की समस्त वसूली ये मान्यवर करते हैं इनको कच्चे आम बहुत पसंद है अगर जल्दी काम कराना है तो इनको कच्चे आम गिफ्ट में दे काम हो जायेगा इस सारी दुर्व्यवस्थाओ पर प्रबंधतंत्र शांत है इसका केवल एक कारण समझ में आता है की यहाँ से ऊपरी कमाई प्रबंधक और अध्यक्ष को भी होगी अन्यथा सांसद का प्रतिनिधि ये दुराचार अपने यहाँ होने दे असंभव है, शायद हमारे प्रश्नों के उत्तर सांसद महोदय के पास हो मगर उनसे बात नहीं हो पा रही है। 

(तारिक आज़मी - लेखक जीबी न्‍यूज के यूपी हेड हैं)

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